गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

भारत सरकार की कूटनीति ... चीनी सेना अब पैंगोंग झील से भागना पडा

 


आज भारत सरकार की कूटनीति और कठिन हालात लदाख सीमा के बार्फिले क्षेत्र में डटे भारतीयों सेना के जवानों के शौर्य की बदौलत पिटे मुह से चीनी सेना अब पैंगोंग झील से उल्टे पैर वापस लौटने लगा है। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में यह बड़ी जानकारी देते हुए कहा कि बुधवार से सेना की वापसी शुरू हो गई है। भारत ने इस बातचीत में कुछ भी नहीं खोया है हम अपनी एक इंच जमीन किसी को भी नहीं लेने देंगे हमारे संकल्प के कारण यह फल मिला है कि चीनी सेना पैगॉन्ग लेक के दक्षिणी और उत्तरी इलाके से हटने लगी है चीनी सरकार ने भी कहा है कि बुधवार से कि पैगॉन्ग लेक के दक्षिणी और उत्तरी इलाके से भारत-चीन की सेना ने डिसइंगेजमेंट की प्रोसेस शुरू कर दी है। चीन की सरकार मीडिया ने बुधवार को दावा किया कि लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारत के साथ 10 महीने से चल रहा टकराव खत्म हो गया है।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने जब देश को यह जानकारी दी उस समय सदन में पीएम नरेंद्र मोदी और गैलरी में आर्मी चीफ मुकुंद नरवणे भी मौजूद थे। भारत और चीन के बीच 24 जनवरी को 9वें राउंड की बातचीत 15 घंटे चली थी। उन्होंने बताया कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन और भारत के बीच सेना की वापसी का समझौता हुआ है। चीन की मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के स्पोक्सपर्सन वू कियान ने बताया कि चीन और भारत के बीच हुई कमांडर लेवल की 9वें दौर की बातचीत में डिसइंगेजमेंट पर सहमति बनी थी। इसके तहत ही दोनों देशों ने अपने सैनिकों को पैंगॉन्ग हुनान और नॉर्थ कोस्ट से पीछे हटाना शुरू कर दिया है। इसके बाद चीनी विदेश मंत्रालय का बयान आया। स्पोक्सपर्सन वांग वेनबिन ने कहा कि रूस में हुई बैठक में दोनों देशों के विदेश मंत्री इस मसले का हल निकालने पर राजी हुए थे। 

भारत और चीन के बीच 24 जनवरी को 9वें राउंड की बातचीत 15 घंटे चली थी। इसमें भारत ने कहा था कि विवाद वाले इलाकों से सैनिक हटाने और तनाव कम करने के प्रोसेस को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब चीन पर है। इस दौरान दोनों पक्ष कोर कमांडरों की 9वें दौर की बातचीत जल्द करने पर भी सहमत हुए थे, ताकि सैनिकों की वापसी का काम तेज हो सके। पेंगोंग झील क्षेत्र में चीन के साथ हुए समझौतों में चीन की सेना उत्तरीय किनारे में फिगर 8 के पूर्व दिशा की ओर रहेगा वही भारत की सेना फिगर 3 के पास अपने धन सिंह थापा पोस्ट पर रहेगा चीनी सेना इस दौरान जो भी निर्माण किया है, उसे भी हटाना होगा इन सारी कारवाही के 48 घंटे बाद पुनः वरिष्ठ कमांडर स्तरीय बातचीत होगी जो बचे हुए मुद्दें पर बातचीत होगी   

2019 में चीन से फैला करोना वाइरस पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया इसी समय पूरी दुनिया में चीन का विरोध होने लगा। कई देशों में दिनदिनों में करोना वाइरस के कारण जन और आर्थिक हानि होने लगी भारत सहित कई देशों में लाकडाउन लगाना पड़ा था इसी समय कई देश मांग करने लगे की कोरोना वाइरस की जाँच हो की इस वाइरस को फैलाने में चीनियों का हाथ है इस मुद्दे पर भारत सरकार भी सहमत है, की WHO कोरोना वायरस की जाँच करे। चीन इस मौका का फायदा उठाकर भारत के कुछ क्षेत्र में घुसने की कोशिश किया। चीन और भारत की सेनाएं पूर्वी लद्दाख में पिछले साल अप्रैल-मई से आमने-सामने हैं। 15 व 16 जून 2020 को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे तथा चीन के भी 80 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे, लेकिन अब चीन ने स्वीकार नहीं किया की उसके भी सैनिक मारे गए है। अमेरिका द्वारा लिए गए सेटेलाइट से चित्र से पता चला की कई बार चीनी सेनाओं से वहा से घायलों को ले जाने के लिए गाड़ी और एयरलिप्त किया गया है।   

चीन और भारत की सेना कई बार बातचीत हुई लेकिन सहमति नहीं बनी वही भारत ने धीरे धीरे चीन के साथ आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने शुरू किये चीन के सामानों का भारत में जोरदार विरोध होने लगा, जनता के मांग को भारत सरकार ने माना और चीनी APP को प्रतिबन्ध लगा दिया, इससे चीन को बहुत ही आर्थिक नुकसान होने लगा कोरोना वायरस के कारण जापान और अमेरिका की कई कम्पनी चीन से अपना कारोबार बंद कर भारत तथा कई देशों में जाने लगे इससे चीन को बहुत ही आर्थिक नुकसान होने लगा है भारत ने चीनी सामानों पर प्रतिबन्ध काम आया चीन भारत के सामने घुटने के बल पर आ गया है        

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

एक समय ऐसा आया की लड़ाकू विमान तेजस को फाइलों में बंद करने नौबत आ गई थी -

आज प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा कि एक समय था जब हमारे अपने लड़ाकू विमान तेजस को फाइलों में बंद करने नौबत आ गई थी लेकिन हमारी सरकार ने अपने इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तेजस की क्षमताओं पर भरोसा किया और तेजस आज शान से आसमान में उड़ान भर रहा है। कुछ सप्ताह पहले ही तेजस के लिए ही 48 हजार करोड़ रुपए का आर्डर दिया गया है।एचएएल को भारतीय वायुसेना से 83 नए स्वदेशी एलसीए तेजस एमके1ए के निर्माण का अनुबंध मिला है, जिसकी अनुमानित लागत 48,000 करोड़ रुपये से अधिक है।  

तेजस का नाम 4 मई 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रखा था। तेजस एक संस्कृत शब्द है, जिसका मतलब होता है अत्यधिक ताकतवर ऊर्जा। तेजस के तेज का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब बहरीन इंटरनेशनल एयर शो के लिए तेजस का नाम प्रस्तावित हुआ था तब पाकिस्तान और चीन ने अपना थंडरबर्ड का नाम इस एयर शो से वापस ले लिया था। यह भारत के हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा विकसित एक सीट और एक जेट इंजन वाला एक हल्का व कई तरह की भूमिकाओं वाला जेट लड़ाकू विमान है। यह एचएएल इंजीनियरिंग द्वारा, अनेक भूमिकाओं को निभाने में सक्षम एक हल्का युद्धक विमान है तथा यह बिना पूँछ का, कम्पाउण्ड-डेल्टा पंख वाला विमान है। इसका विकास 'हल्का युद्धक विमान' या (एलसीए) नामक कार्यक्रम के अन्तर्गत हुआ है, जो 1980 के दशक में शुरू हुआ था। यह विमान पुराने पड़ रहे रसियन मिग-21 का स्थान लेने के लिए बनाया गया है। इसे 1994 में बनकर तैयार हो जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जब पूरी दुनिया पोकरण के बाद प्रतिबन्ध लगाया तब ही 4 जनवरी 2001 दो प्रोटोटाईप तेजस तैयार हुआ। इसे भारतीय वायु सेना में कमीशन होने में 35 वर्ष लग गये। यह कहा जाये तो कि तेजस के मिशन में बहुत देर किया गया है। 

यह हमारे देश की राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी तथा विदेश पर निर्भर रहना तथा देश में नेता व अधिकारियों की कमीशन खोरी के कारण यह देरी हुई है। 1 जुलाई 2016 को भारतीय वायुसेना की पहली तेजस यूनिट का निर्माण किया गया, जिसका नाम 'नम्बर 45 स्क्वाड्रन आई ए एफ फ्लाइंग ड्रैगर्स' है।


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

चौरी चौरा शताब्दी समारोह की शुरूआत


 

भारतीय स्वत्रन्त्रता आन्दोलन के इतिहास के पन्नों में दर्ज है 4 फरवरी, 1922 को चौरीचौरा से सटे भोपा बाजार में सत्याग्रही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जुलूस निकाल रहे थे। चौरीचौरा थाने के सामने तत्कालीन थानेदार गुप्तेश्वर सिंह ने उन्हें रोका तो झड़प हो गई। एक पुलिसकर्मी ने किसी सत्याग्रही की टोपी पर बूट रख दिया तो भीड़ बेकाबू हो गई। पुलिस की फायरिंग में 11 सत्याग्रही शहीद हो गए और कई जख्मी भी हुए। इससे सत्याग्रही भड़क उठे और उन्होंने चौरीचौरा थाना फूंक दिया। इसमें 23 पुलिसवाले जिंदा जल गए। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने सैकड़ों सत्याग्रहियों पर मुकदमे चलाए, 19 सत्याग्रही फांसी पर चढ़ा दिए गए। घटना से व्यथित महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था।

घटना में मारे गए पुलिसवालों की याद में 1924 में अंग्रेज अफसर विलियम मौरिस ने थाना परिसर में शहीद स्मारक बनवा दिया। देश आजाद होने के बाद भी वर्षों तक किसी ने कोई पहल नहीं की। करीब 60 साल बाद बाबा राघवदास जैसे मनीषी जब आगे आए और इस स्मारक को खुद ही तोड़ने निकले तब बहस और तेज हुई। बाद में 1993 में तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अमर शहीदों की याद में स्मारक का लोकार्पण किया। तब से यहां शहीदों की याद में कार्यक्रम होते हैं।

 

म्यांमार की सेना ने की तख्ता पटल ...चीनियों का हाथ तो नहीं .....

भारत के पडोसी देश म्यांमार की महिला अरोबिग डांसर खिंग हनिन वाई, वह अपना एक्सरसाइज डांस कर रही है। वही पीछे में सेना देश की संसद में घुसकर तख्ता पटल कर, म्यांमार में आपातकाल १ वर्ष के लिए लगा दिया है। उस महिला ने बताया कि म्यांमार की संसद भवन के पास ही एक्सरसाइज करते हुए वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी। इसी समय म्यांमार की सेना ने काफिले के साथ संसद भवन में घुस रही थी। जिसे महिला अरोबिग डांसर खिंग हनिन वाई केइस वीडियो को सोशल मीडिया पर 1 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है।

म्यांमार की सेना ने एक वर्ष के लिए आपातकाल के तहत देश की सत्ता को अपने कब्ज़ा में कर लिया है। खबरों में बताया गया है कि स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया गया है। भारत सहित विश्व भर की सरकारों एवं अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने तख्तापलट की घोर निंदा की है इससे म्यांमार में सीमित लोकतांत्रिक सुधारों को बहुत बड़ा झटका लगा है। एक प्रकार से म्यांमार में लोकतंत्र की सेना ने हत्या कर दिया। रोहिंग्या के अत्याचार के कारण विश्व मंच पर म्यांमार की  कमजोर साख है, साथ ही सेना ने सत्ता पर कब्ज़ा कर को बट्टा लग गया है। अत में इसके पीछे चीन का हाथ तो नहीं है ...... 

म्यांंमार में तख्तातपलट पर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा है, 'म्यांमार में जो कुछ हुआ है, हमने उसका संज्ञान लिया है चीन, म्यांमार का मित्र और पड़ोसी देश है। हमें उम्मीद है कि म्यामांर में सभी पक्ष संविधान और कानूनी ढांचे के तहत अपने मतभेदों को दूर करेंगे और राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता बनाए रखनी चाहिए।' चीन की इस प्रतिक्रिया पर अधिकांश देश शक की नजरों से देख रहे है। क्योंकि चीन-म्यांतमार आर्थिक कॉरिडोर को ड्रैगन आगे बढ़ाना चाहता है। लेकिन आने वाले महीने एक महीने पहले की स्थिति की तुलना में उसके लिए अनिश्चित होने जा रहे हैं। पाकिस्तान में सीपेक ( चीन पाकिस्तान आर्थिक कारीडोर ) का भारी विरोध हो रहा है। जिसमे चीन को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है, इस आर्थिक नुकसान की भरपाई करने के लिए चीन म्यांमार की तरफ ध्यान देना शुरू किया था। लेकिन म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू की कोरोना काल में भारत के तरफ ज्यादा झुकाव हो रहा था। चीन म्यांमार की सेना के सहारे म्यांमार की सत्ता तक पहुचना चाह रहा था। यहाँ पर म्यांमार की सेना पाकिस्तान की तरह नहीं है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

बोफोर्स का जिन्न अभी भी जिन्दा है -

CBI के पूर्व चीफ श्री आर. के. राघवन ने कहा है कि एक पार्टी की सरकार ने बोफोर्स की जांच में पलीता लगा दिया। राघवन ने अपनी आत्मकथा ‘अ रोड वेल ट्रैवल्ड’ में कहा कि- मामला इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि किस तरह एक पार्टी की सरकार ने एक सही मामले की जांच को पलीता लगा दिया, जिसके पास बहुत कुछ छिपाने को है। पूर्व सीबीआई चीफ ने कहा कि अदालत में मामला न टिक पाने के लिए वे लोग दोषी हैं जिन्होंने 1990 के दशक में और 2004 से 2014 तक जांच एजेंसी को नियंत्रित किया। 

बोफोर्स कांड में भ्रष्टाचार का यह मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा हुआ। यह सौदा भारतीय थल सेना को 155 एमएम की 400 होवित्जर तोप की सप्लाई के लिए हुआ था। हॉवित्जर तोप सौदे में कथित रिश्वत से जुड़ा है जिसकी वजह से 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता से बाहर जाना पड़ा था। आरोप था कि कंपनी ने नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और नौकरशाहों को करीब 64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। 16 अप्रैल 1987 स्वीडन के रेडियों से एक समाचार का प्रसारण किया गया। पूरे भारत में हडकम मच गया । यह समाचार था कि बोफोर्स के खरीदी में दलाली दी गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस समाचार को रोकने के लिए पूरी कोशिश किया कई समाचार पत्र को मैनेज कर लिया गया। लेकिन इंडियनएक्प्रेस ने इस समाचार को प्रमुखता से छापा, पूरे देश इस समाचार से स्तब्ध होगा। राजीव गाधी की छवि एक सामान्य जनक नेता की थी । भारत के लोगों को विश्वास नही हुआ कि राजीव गांधी ऐसा भी कर सकते है। बोफोर्स घोटला के नाम से जाना गया और कांग्रेस का ग्राफ गिरता ही गया । 

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी पत्नी सोनिया गांधी के करीबी दोस्त माने जाने वाले क्वात्रोच्चि पर इस सौदे में एजेंट की भूमिका निभाया था। सोनिया के मित्र क्वात्रोच्चि पर आरोप था कि इस सौदे के बदले उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद को आश्वासन दिया था कि बोफोर्स तोप खरीद में कोई घोटाला नहीं हुआ है। देश ने इस घोटाले में राजीच गांधी को दोषी मानते हुए 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

ताइवान नेशनल पर भारतीयों का जोश देखकर चीन बौराया...

आज भारत सहित पूरी दुनिया HappyNationalDayTaiwan मना रहा है। चीन को पता था कि भारत के लोग TaiwanNationalDay मनाएंगे। इसलिए भारत सरकार से कहा था कि भारत में कोई भी नहीं #ताईवान_दिवस मनाये। भारत सरकार ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक मूल्यों का राष्ट्र है। यहाँ पर प्रेस मीडिया को स्वतंत्र है इन्हें सरकार द्वारा नहीं रोक जा सकता है। आज इंडियन एक्सप्रेस ने एक पेज विज्ञापन छापा है। हम भारतीयों की एक खास विशेषता है जिस काम को मना किया जा है उस काम को पहले करते हैं। लेकिन #China यह बात नही समझा।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

6 दिसंबर1992 को विवादित ढांचा गिरने के 28 साल बाद, सभी आरोपी बरी

 

6 दिसंबर 1992 का दिन भारतीय राजनीति में टर्निग पॉइंट रहा है। राम मंदिर आन्दोलन ने भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया है। इसी आंदोलन से भाजपा का उदय हुआ और कांग्रेस के पतन की शुरुआत हुई।

इसी दिन लाखों कारसेवकों ने मिलकर बाबरी मस्जिद नाम से विवादित ढांचे को गिरा दिया था। 1992 में अयोध्या में जो हुआ, उसकी नींव 1990 में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के साथ ही पड़ गई थी। उस वक्त 'कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा काफी चला था। इसके बाद धीरे-धीरे मुद्दे ने रंग पकड़ा और 1992 में 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो' के साथ मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया गया। 6 दिसंबर को आखिर 28 साल पहले क्या हुआ था

सुबह करीब 10.30 बजे वरिष्ठ नेता बीजेपी और वीएचपी नेताओं ने विवादित ढांचे के पास पहुंचकर राम शिला की पूजा-अर्चना की गई। इसमें एल के आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी के साथ कई संत भी शामिल थे। इनके पीछे थे करीब 1.5 लाख कारसेवक।