मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

यूरी गागरिन की अंतरिक्ष में 60 वर्ष, रूस ने इस पर घटना का जश्न मनाया

 


12 अप्रैल 1961मॉस्को में सुबह के 9:37 बज रहे थे। पूरा सोवियत संघ सांस थामे एकटक आसमान की ओर देख रहा था। जैसे ही वोस्टॉक-एयरक्राफ्ट को लॉन्च किया गयासभी की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। 108 मिनिट बाद वह कुशलपूर्वक वापस पृथ्वी पर लौट तो इतिहास बन गया था। इस क्षण जो हुआवो इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ था। पहली बार किसी इंसान ने अंतरिक्ष में कदम रखा। यह अंतरिक्ष की लड़ाई में अमेरिका पर सोवियत संघ की जीत थी इसके साथ ही यूरी गागरिन का नाम भी इतिहास में दर्ज हो गया। एक किसान माता-पिता के बेटे यूरी गागरिन जब अंतरिक्ष में गए तो कोई उन्हें नहीं जानता था लेकिन जब वे लौटे तो दुनिया भर में मशहूर हो गए थे वे रूस के राष्ट्रीय हीरो तो बन साथ ही पूरी दुनिया ने उनका स्वागत एक हीरो की तरह किया।

1934 में रूस के क्लूशीनो गांव में जन्मे यूरी एलेक्सेविच गागरिन एक बढ़ई के बेटे थे। जब यूरी 6 साल के थे, तब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनके घर पर एक नाजी अधिकारी ने कब्जा कर लिया। उनके पूरे परिवार को दो साल तक झोपड़ी में रहना पड़ा। नाजियों ने उनकी 2 बहनों को बंधुआ मजदूर बनाकर जर्मनी भेज दिया।

वह जब 16 वर्ष के हुए तो मॉस्को चले गए। वहां उन्हें सरातोव के एक टेक्निकल स्कूल में जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने एक फ्लाइंग स्कूल को ज्वॉइन कर लिया। यहीं से उनके मन में प्लेन में बैठकर आसमान छूने का सपना पलने लगा। 1955 में उन्होंने पहली बार अकेले विमान उड़ाया। 1957 में ग्रेजुएशन पूरा कर यूरी एक फाइटर पायलट बन गए थे।

1957 में ही सोवियत संघ ने पहले सेटेलाइट स्पूतनिक-1 को अंतरिक्ष में स्थापित किया था। इसके बाद तय किया गया कि अब इंसान को अंतरिक्ष में भेजा जाए। इसके लिए पूरे देश से आवेदन मंगवाए गए। हजारों लोगों की कड़ी मानसिक और शारीरिक परीक्षा ली गई। आखिरकार 19 लोगों का चयन हुआ। यूरी गागरिन भी इनमें से एक थे।

अंतरिक्ष से लौटने के बाद गागरिन दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग देने लगे। 27 मार्च 1968 को ऐसे ही एक ट्रेनिंग सत्र के दौरान उनका मिग-15 जहाज हादसे का शिकार हो गया। हादसे में यूरी गागरिन और साथी पायलट की मौके पर ही मौत हो गई। उन्हें सम्मान देने के लिए 1968 में उनके होम टाउन का नाम बदलकर 'गागरिन' रख दिया गया।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

ध्येय आया देह लेकर- डॉ केशव बलिराम हेडगेवार


 

आज भारत में हिन्दू, हिंदुत्व, राष्ट्रीयता और राम मंदिर पर बात हो रही, इसकी पृष्ठ भूमिका डॉ हेडगेवार के जन्म से शुरू हो गया था। ऐसा व्यक्तित्व हजारों वर्षो के तप के बाद अवतरण होता है। अपने 50 वर्ष के जीवनकाल में आने वाले 100 वर्ष पूर्व का भारत का कल्पना कर लिए थे। अपने जीवन का अनमोल क्षण एक ध्येय के लिए समर्पित कर गए की आने वाली पीढ़िया ऐसे ही राष्ट्रीय कार्य करने के लिए समर्पित होते रहे।

डॉ॰ हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल, 1889 को महाराष्ट्र के नागपुर जिले में पण्डित बलिराम पन्त हेडगेवार के घर हिन्दू वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। आपकी माता का नाम रेवतीबाई था। माता-पिता ने पुत्र का नाम केशव रखा। केशव का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होता रहा। उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था। पिता बलिराम वेद-शास्त्र एवं भारतीय दर्शन के विद्वान थे एवं वैदिक कर्मकाण्ड (पण्डिताई) से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे। वैसे तो हेडगेवार परिवार मूल रूप से तेलंगाना के कांडकुर्ती गांव का रहने वाला था। लेकिन हैदराबाद (तेलंगाना) के मुस्लिम शासक निजाम ने वहाँ के हिन्दुओ का जीना दूभर कर दिया था। यहाँ तक कि कोई हिन्दू मंदिर नहीं बना सकता था और यज्ञ आदि करने पर भी प्रतिबन्ध था। इसलिए मराठा वंश के भोसले के राज्य नागपूर में आकर वैदिक कर्मकांड उचित विधान से कर सके। जब केशव 13 बरस के थे, तो प्लेग की वजह से उनके माता-पिता का निधन हो गया। उनके बड़े भाई महादेव पंत और सीताराम पंत ने उनकी पढ़ाई-लिखाई का ख़्याल रखा।

केशव के सबसे बड़े भाई महादेव भी शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे ही मल्ल-युद्ध की कला में भी बहुत माहिर थे। वे रोज अखाड़े में जाकर स्वयं तो व्यायाम करते ही थे गली-मुहल्ले के बच्चों को एकत्र करके उन्हें भी कुश्ती के दाँव-पेंच सिखलाते थे। महादेव भारतीय संस्कृति और विचारों का बड़ी सख्ती से पालन करते थे। केशव के मानस-पटल पर बड़े भाई महादेव के विचारों का गहरा प्रभाव था। किन्तु वे बड़े भाई की अपेक्षा बाल्यकाल से ही क्रान्तिकारी विचारों के थे। जब वो हाई स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे तो वंदेमातरम गाने की वजह से उन्हें निकाल दिया गया था क्योंकि ऐसा करना ब्रिटिश सरकार के सर्कुलर का उल्लंघन था। हाई स्कुल के बाद उन्हें साल 1910 में मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता भेज दिया गया। घर से कलकत्ता गये तो थे डाक्टरी पढने परन्तु वापस आये उग्र क्रान्तिकारी बनकर। कलकत्ता में श्याम सुन्दर चक्रवर्ती के यहाँ रहते हुए बंगाल की गुप्त क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य बन गये। डॉक्टरी करते करते ही उनकी तीव्र नेतृत्व प्रतिभा को भांप कर उन्हें हिन्दू महासभा बंगाल प्रदेश का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया। इस प्रकार अनेक क्रान्तिकारियों की साथ में रहकर समस्त गतिविधियों का ज्ञान और संगठन-तन्त्र की गुणदोषों को सीखे और समझे। 1914 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण किया और साल 1915 में वो डॉक्टर के रूप में नागपुर लौट आए। परन्तु घर वालों की इच्छा के विरुद्ध देश-सेवा के लिए नौकरी और विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

डॉ हेडगेवार के मन में शासकीय सेवा में या अपना अस्पताल खोलकर पैसा कमाने के लिये डॉक्टर नहीं बने। भारत का स्वातंत्र्य यही उनके जीवन का ध्येय था। उस ध्येय का विचार करते करते उनके ध्यान में स्वतंत्रता हासिल करने हेतु क्रांतिकारी क्रियारीतियों की मर्यादा में रहकर करने की आवश्कता है। दो-चार अंग्रेज अधिकारियों की हत्या होने के कारण अंग्रेज यहाँ से भागनेवाले नहीं थे। किसी भी बड़े आंदोलन के सफलता के लिये व्यापक जनसमर्थन की आवश्यकता होती है। क्रांतिकारियों की क्रियाकलापों में उसका अभाव था। सामान्य जनता में जब तक स्वतंत्रता की प्रखर भाव निर्माण नहीं होती, तब तक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी और मिली तो भी टिकेगी नहीं, यह बात अब उनके मनपर अंकित हो गई थी।

1921 में अंग्रेजो ने तुर्की को परास्त कर, वहां के सुल्तान को गद्दी से उतार दिया था वही सुल्तान मुसलमानों के खलीफा भी कहलाते थे। ये बात भारत व अन्य मुस्लिम देशों के मुसलमानों को नागवार गुजरी जिससे जगह-जगह आन्दोलन हुए, हिन्दुस्थान में खासकर केरल के मालाबार जिले में आन्दोलन ने उग्र रूप ले लियास। 1922 में भारत के राजनीतिक पटल पर गांधी के आने के पश्चात ही मुस्लिम सांप्रदायिकता ने अपना सिर उठाना प्रारंभ कर दिया। खिलाफत आंदोलन को गांधी जी का सहयोग प्राप्त था - तत्पश्चात नागपुर व अन्य कई स्थानों पर हिन्दू, मुस्लिम दंगे प्रारंभ हो गये तथा नागपुर के कुछ हिन्दू नेताओं ने समझ लिया कि हिन्दू एकता ही उनकी सुरक्षा कर सकती है। ऐसी कई बातें डॉ हेडगेवार को भी खटकने लगी वह सोचने को प्रवृत हुए कि समाज में जिस एकता और धुंधली पड़ी देशभक्ति की भावना के कारण हम परतंत्र हुए है वह केवल कांग्रेस के जन आन्दोलन से जागृत और पृष्ट नही हो सकती जन-तन्त्र के परतंत्रता के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगाने का कार्य बेशक चलता रहे लेकिन राष्ट्र जीवन में गहरी हुयी विघटनवादी प्रवृति को दूर करने के लिए कुछ  उपाय करने की मुझे जरूरत है इसी विचार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि बनी 

1925 में विजयदशमी के दिन भोसले के बाडे जिसे मोहितेबाड़े के कुछ भाग को साफसुथरा कर छोटे बच्चों के साथ खेल खेल से शुरू हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ .....     


शनिवार, 10 अप्रैल 2021

हिंदुओं का ध्रुवीकरण



बंगाल में चौथे चरण के मतदान के बीच में बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने क्लब हाउस ऐप के कुछ ऑडियो को ट्वीट किया है। वीडियो क्लब हाउस ऐप पर चल रही चर्चा की ऑडियो रिकॉर्डिंग के हैं, जिसमें प्रशांत किशोर कुछ पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहे हैं। वीडियो में स्पष्ट रूप से प्रशांत किशोर कहते सुनाई दे रहे हैं कि वोट मोदी के नाम पर हैं, हिंदू होने के नाम पर ध्रुवीकरण, हिंदी भाषी, SC ही चुनाव के फैक्टर हैं। मोदी यहां पॉपुलर हैं, मतुआ समुदाय बड़ी संख्या में बीजेपी के लिए वोट कर रहा है। बंगाल में टीएमसी के खिलाफ एंटी इंकंबैंसी है, न कि मोदी के खिलाफ, वे यह भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि बंगाली की राजनीति का इकोसिस्टम मुस्लिम वोटों को हासिल करने का ही रहा है लेकिन पहली बार हिंदुओं को लग रहा है कि उनकी बात हो रही है।

बीजेपी इस ऑडियो के आधार पर दावा कर रही है कि खुद प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी की हार स्वीकार कर ली है। प्रशांत किशोर ने बीजेपी के दावे पर कहा है कि बीजेपी को सच्चाई सामने लाने के लिए पूरा ऑडियो रिलीज करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी बात इस सवाल के जवाब में थी कि "बीजेपी को लगभग 40% वोट कैसे मिल रहे हैं और ऐसी धारणा क्यों है कि बीजेपी जीत रही है"।

आपको बता दें कि Club House एक एप है, जहां ऑडियो कॉन्फ्रेंस की जाती है. इसी ऑडियो कॉन्फ्रेंस की बातचीत का किसी ने संभवतः दूसरे फोन से वीडियो बनाया है क्योंकि क्लब हाउस में इस तरह की रिकॉर्डिंग की सुविधा नहीं होती. ये वीडियो के हिस्से बीजेपी ने लीक किए हैं। इस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर के साथ कई पत्रकार शामिल हुए थे।

1947 में अंग्रेजों ने भारत को धर्म के आधार पर विभाजन कर आजादी दिया था। आजाद भारत हमेशा सभी पंथ,सम्प्रदाय, विचारों और परंपरा को आदर और सम्मान पूर्वक मानता रहा है।

इसलिए भारत एक तरह से धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में दुनिया में अपना स्थान बनाया है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

ज्ञानवापी मंदिर


आज 9 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने हिन्दुओं के पवित्र मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सुबह वाराणसी के घाट पर 9 अप्रैल को सूर्य ग्रहण का था। ग्रहण के दौरान काशी में गंगा में स्नान कर पास में स्थित विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए काफी संख्या में हिंदू इकट्ठा हुए थे। तभी अचानक आसपास हंगामा होने लगा मुगलों की सेना मंदिर को चारों तरफ घेर लिया और मंदिर के अंदर प्रवेश करें। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सबसे पवित्र मंदिर बाबा विश्वनाथ के मंदिर में घुसकर मंदिर के अंदर स्थित मूर्तियों यदि को तोड़फोड़ करने लगी और  बाबा विश्वनाथ के मंदिर को तोड़कर मस्जिद खड़ा कर दिया गया 

प्राचीन काल में वाराणसी को काशी के रूप में जाना जाता है और इसलिए इस मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर के रूप में जाना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर को भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। ज्योतिर्लिंग को सर्वोच्च भगवान शिव का प्रतिनिधित्व माना जाता है जिसका अर्थ है परम सर्वशक्तिमान की उज्ज्वल छवि। मुख्य देवता को श्री विश्वनाथ और विश्वेश्वर के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है ब्रह्मांड के भगवान। भगवान शिव कैलाश पर्यवत के बाद यहाँ ही निवास करते हैं और मुक्ति और सुख के दाता हैं। हिन्दुओं में मान्यता यह है कि काशी विश्वनाथ मंदिर और पवित्र गंगा नदी में स्नान करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। जो लोग मंदिर में स्वाभाविक रूप से मृत्यु को प्रापत करते हैं, वे परम धाम का सुख प्रापत होता हैं। स्वयं भगवान शिव उनके कान में मोक्ष का मंत्र फूँकते हैं।

विश्वनाथ मंदिर गंगा नदी के तट पर वाराणसी की भीड़ भरी गलियों के भीतर स्थित है। मंदिर में विश्वनाथ लेन नाम की एक गली से पहुँचा जा सकता है। यहाँ एक छोटा कुआँ भी है, जिसे ज्ञान वापी (ज्ञान वापी) के नाम से जाना जाता है, मंदिर परिसर के बीच में ज्ञान कुआँ है। विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग को आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इस कुएं में छिपा पाया गया था। इस मंदिर का मुख्य पुजारी इसे छिपाने के लिए शिवलिंग के साथ कुएं में कूद गए थे। इस मंदिर की पूरी संरचना के कुल तीन भाग हैं। पहले में भगवान विश्वनाथ यानि महादेव के मंदिर पर एक शिखर शामिल है। दूसरा सोने का गुंबद है और तीसरा सोने का शिखर है। तीसरा सबसे ऊपर भगवान विश्वनाथ का ध्वज और त्रिशूल है। काशी विश्वनाथ मंदिर इसलिए स्वर्ण मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है।

काशी विश्वनाथ मंदिर को कई बार नष्ट और पुनर्निर्मित किया गया है। मंदिर का निर्माण 1490 में हुआ था। काशी विश्वनाथ का प्रारंभिक ज्योतिर्लिंग नहीं मिला था। मूल विश्वनाथ मंदिर को मुगल मोहम्मद गोरी के आदेश पर कुतुबूद-दीन ऐबक की सेना ने नष्ट कर दिया था।

ऐतिहासिक अभिलेखों में कहा गया है कि मंदिर को कई शताब्दियों तक विभिन्न शासकों द्वारा फिर से बनाया गया। मुगलों ने मंदिर को बार-बार लूटा। यद्यपि मुगल सम्राट अकबर ने मूल मंदिर बनाने की अनुमति दी थी, लेकिन उसके पोते औरंगजेब ने 17 वीं शताब्दी में मंदिर को नष्ट कर दिया। अकबर के पोते ने फिर से वहां ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया। मूल मंदिर के अवशेषों को मस्जिद के ठीक पीछे देखा जा सकता है।

पुणे में मराठाओं के बीच में से शिवाजी नाम का युवा राजा का उदय हुआ तभी बनारस के पंडितों ने पुणे जाकर हिन्दुओं की रक्षा के लिए शिवाजी राजा का राज्याभिषेक किया जिसके बाद मराठा सामाज्य का राज्य शुरू हुआ छत्रपति शिवाजी महाराजे का राज्याभिषेक के बाद स्थिति बदलना शुरू हुआ तब जाकर हिन्दुओं को लगाने लगा अब हिन्दवी स्वराज्य का पुन: उदय होगा 1777 इंदौर की रानी, ​​रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा मस्जिद से सटे वर्तमान ढांचे का निर्माण किया गया था। ऐसा माना जाता है कि रानी के सपनों में भगवान शिव प्रकट हुए थे। महाराजा रणजीत सिंह ने 1000 किलो के स्वर्ण शुद्ध होने से बनाया गया 

8 अप्रेल 2021 को उत्तरप्रदेश के  वाराणसी की सिविल कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व विभाग को काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद के विवादित स्थल पर सर्वेक्षण कराने की मंजूरी दी है। वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट आशुतोष तिवारी की अदालत ने प्राचीन मूर्ति स्वयंभू विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी के वर्ष 1991 से लंबित इस प्राचीन मुकदमे आवेदन को स्वीकार कर लिया।

याचिका में कहा गया कि मौजा शहर खास स्थित ज्ञानवापी परिसर के आराजी नंबर 9130, 9131, 9132 रकबा एक बीघे नौ बिस्वा जमीन का पुरातात्विक सर्वेक्षण रडार तकनीक से करके यह बताया जाए कि जो जमीन है, वह मंदिर का अवशेष है या नहीं। साथ ही विवादित ढांचे का फर्श तोड़कर देखा जाए कि 100 फीट ऊंचा ज्योतिर्लिंग स्वयंभू विश्वेश्वरनाथ वहां मौजूद हैं या नहीं। दीवारें प्राचीन मंदिर की हैं या नहीं। याचिकाकर्ता का दावा था कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अवशेषों से ही ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ था। जिसमें उन्होंने मांग की थी कि मस्जिद, ज्योतिसिर्लिंग विश्वेश्वर मंदिर का एक अंश है। जहां हिंदू आस्थावानों को पूजा-पाठ, दर्शन और मरम्मत का अधिकार है। कोर्ट से ये मांग स्वयंभू ज्योतिर्लिंग विश्वेश्वर के पक्षकार पंडित सोमनाथ व्यास ने किया था। याचिकाकर्ता का दावा है कि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 2050 साल पहले महाराज विक्रमादित्य ने करवाया था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब ने साल 1664 में मंदिर को नष्ट करा दिया था। पूरे मामले में वादी के तौर पर स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर काशी विश्वनाथ और दूसरा पक्ष अंजुमन इंतजामिया मसाजिद और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड हैं।

 


रविवार, 4 अप्रैल 2021

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले, 22 जवान शहीद, गृहमंत्री अमित शाह ने टॉप लेवल मीटिंग बुलाई

 


छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के जिले बीजापुर के तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास नक्सलियों ने 700 जवानों को एबुश लगाकर घेरकर तीन ओर से फायरिंग शुरू कर दी। मुठभेड़ शनिवार को दोपहर करीब 12.30 बजे शुरू हुई और शाम करीब 5.30 बजे यानी 5 घंटे तक चली। इस दौरान नक्सलियों ने UGNL, रॉकेट लांन्चर, इंसास और AK-47 से हमला किया। इस हमले में 22 जवान शहीद हो गए। इनमें कोबरा बटालियन के 9, DRG के 8, STF के 6 और एक बस्तरिया बटालियन का जवान शामिल है।

बीजापुर एनकाउंटर को लेकर गृहमंत्री अमित शाह ने असम से अपनी चुनावी रैली को छोड़कर दिल्ली लौटे और रविवार शाम टॉप लेवल मीटिंग बुलाई। दिल्ली में शाह के निवास पर हुई इस मीटिंग में गृह सचिव अजय भल्ला, IB के डायरेक्टर अरविंद कुमार और CRPF के सीनियर अधिकारी मौजूद रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवानों के शहीद होने पर दुख जताया है। उन्होंने कहा कि वीर जवानों के बलिदान को कभी नहीं भुलाया जाएगा। मेरी संवेदनाएं छत्तीसगढ़ में शहीद हुए जवानों के परिजनों के साथ हैं। उन्होंने घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की।

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिग जिले में नक्सलबाड़ी नाम का गाँव में 25 मई 1967 को सशस्त्र क्रांति हुई। जिसका नेतृत्व कान्यु सान्याल और चारू मजुमदार ने किया था। नक्सलबाड़ी के नाम से नक्सलवाद शुरू हुआ, कुछ ही समय में यह आन्दोलन वैचारिक जन आन्दोलन का रूप ले लियाचाय बागान में काम करने वाले मजदुर और जमीदारों के बीच में मजदूरी को लेकर हुए विवाद में हिंसक आदोलन का रूप ले लिया। इस प्रकार हिंसा से शुरू हुआ आन्दोलन एक विकराल रूप ले लिया। नक्सलवादियों का मानना है की राजनीतक सत्ता बन्दूक की नोक से मिलती है ऐसे विचारधारा के लोग चीन के माओ से प्रभावित होकर भारत में सशस्त्र क्रांति से राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना चाहते है और बंदूक के दम से पश्चिम बंगाल में सत्ता का परिवर्तन किया भी इस आन्दोलन की सफलता ने बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़,  आध्रप्रदेश, तेलगाना और महाराष्ट्र में बहुत ही नरसंहार किये। जिन लोगो ने नक्सलबाड़ी से यह आन्दोलन शुरू किया था वे लोग पीछे हो गए, अन्य आपराधिक लोगो से इस हिंसक आन्दोलन से सत्ता के शिखर पर पहुच गए 

१९४७ में भारत को अग्रेजों से आजादी मिल है। उस समय तेलगाना की मांग उठाने लगी। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। इस मांग को नेहरू जी ने ध्यान नही दिया था। तेलगाना में कम्युनिस्ट पार्टी का घुसपैठ शुरू हुआ इस। तेलगाना आन्दोलन के माध्यम से बस्तर में नक्सलियों का आगमन हुआ। उस समय बस्तर मध्यप्रदेश का एक संभाग हुआ करता था। प्रवीण भंजदेव सिंह बस्तर के राजा हुआ करते थे। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डी पी मिश्रा से कुछ विवाद होने से, उस समय की मध्यप्रदेश की पुलिस ने जगदलपुर के राज्यमहल में घुसी। 25 मार्च 1966 को मध्यप्रदेश पुलिस के हाथों बस्तर के महाराजा प्रवीण भंजदेव की हत्या हो गई। इस हत्याकांड से पुरे मध्यप्रदेश में प्रदेश सरकार के खिलाफ जनता में विरोध शुरू हो गया। देश भर में नारे लगाये गए की बस्तर की गलियों सुनी है, डी पी मिश्रा दोषी है। बस्तर के महाराजा प्रवीण भंजदेव काफी लोकप्रिय थे। वहा के आदिवासियों में उन्हें देवता के सामान माने जाते थे। इस हत्याकांड से बस्तर में आंधप्रदेश से नक्सलियों आना शुरू हुआ। उन्होंने इस हत्याकांड के बाद से आदिवासियों की सहानभूति प्राप्त कर लिया। इसी हत्याकांड ने बस्तर में आंधप्रदेश से नक्सालियों को घुसने का मौका मिल गया है नक्सालियों ने इस जनभावना का लाभ उठाकर सरकार विरोधी अपना एजेंडा पर काम करना शुरू किया कुछ वर्षो में नक्सलियों ने वही काम शुरू किया जिस काम के लिए जाने जाते है बदलाव के लिए खुनी खेल किया।  

26 मार्च को बीजापुर में माओवादियों ने ज़िला पंचायत के सदस्य बुधराम कश्यप की हत्या कर दी. 25 मार्च को माओवादियों ने कोंडागांव ज़िले में सड़क निर्माण में लगी एक दर्जन से अधिक गाड़ियों को आग लगा दी 23 मार्च को नारायणपुर ज़िले में माओवादियों ने सुरक्षाबल के जवानों की एक बस को विस्फोटक से उड़ा दिया, जिसमें 5 जवान मारे गए इसी तरह 20 मार्च को दंतेवाड़ा में पुलिस ने दो माओवादियों को एक मुठभेड़ में मारने का दावा किया 20 मार्च को बीजापुर ज़िले में माओवादियों ने पुलिस के जवान सन्नू पोनेम की हत्या कर दी

13 मार्च को बीजापुर में सुनील पदेम नामक एक माओवादी की आईईडी विस्फोट में मौत हो गई 5 मार्च को नारायणपुर में आईटीबीपी के एक जवान रामतेर मंगेश की आईईडी विस्फोट में मौत हो गई। 4 मार्च को सीएएफ की 22वीं बटालियन के प्रधान आरक्षक लक्ष्मीकांत द्विवेदी दंतेवाड़ा के फुरनार में संदिग्ध माओवादियों द्वारा लगाये गये आईईडी विस्फोट में मारे गये

माओवादी एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं ऐसा नहीं लगता कि वे कहीं से कमज़ोर हुए हैं सरकार के पास माओवाद को लेकर कोई नीति नहीं है सरकार की नीति यही है कि हर बड़ी माओवादी घटना के बाद बयान जारी कर दिया जाता है कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी मैं चकित हूं कि सरकार इस दिशा में कुछ भी नहीं कर रही है कोई नीति होगी तब तो उस पर क्रियान्वयन होगा

 

सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच पिछले 40 सालों से बस्तर के इलाके में संघर्ष चल रहा है राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ में 3200 से अधिक मुठभेड़ की घटनाएँ हुई हैं. गृह विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2001 से मई 2019 तक माओवादी हिंसा में 1002 माओवादी और 1234 सुरक्षाबलों के जवान मारे गये हैं इसके अलावा 1782 आम नागरिक माओवादी हिंसा के शिकार हुए हैं इस दौरान 3896 माओवादियों ने समर्पण भी किया है। 2020-21 के आंकड़े बताते हैं कि 30 नवंबर तक राज्य में 31 माओवादी पुलिस मुठभेड़ में मारे गये थे, वहीं 270 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया था 


शांति वार्ता का प्रयास -  

21 अप्रैल 2012 - सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का मांझीपारा गांव से नक्सलियों ने अपहरण किया कलेक्टर की रिहाई के लिए सरकार ने नक्सलियों से चर्चा की शुरूआत की. नक्सलियों ने मध्यस्थता के लिए दो नाम तय किए एक नाम बस्तर के पूर्व कलेक्टर बीडी शर्मा और दूसरा नाम प्रोफेसर हरगोपाल बताया

3 मई 2012 - बीडी शर्मा और प्रो. हरगोपाल कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के लिए नक्सलियों से बातचीत करने ताड़मेटला के जंगल गए नक्सलियों से चर्चा के बाद अलेक्स पॉल मेनन को साथ लेकर लौटे

3 मई 2012 - छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों से हुए समझौते के तहत छत्तीसगढ़ के जेलों में निरुद्ध नक्सलियों के मामलों के पुनर्विचार के लिए मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति का गठन किया

4 सितंबर 2014 - निर्मला बुच समिति ने ढाई साल की अवधि में 9 बैठकों में जेल में 2 साल से ज्यादा समय से और छोटे प्रकरणों में निरूद्ध नक्सलियों से जुड़े 654 मामलों पर विचार किया 306 प्रकरणों में बंदियों की जमानत पर रिहाई की अनुशंसा भी की

छत्तीसगढ़ में बड़े माओवादी हमले -

बीजापुर : 03 अप्रैल 2021 बीजापुर में शनिवार को सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में 24 जवान शहीद हो गए।

नारायणपुर : 23 मार्च 2021 नक्सलियों ने नारायणपुर में IED ब्लास्ट के जरिए किया हमला, ब्लास्ट में 5 जवान शहीद हुए थे।

कोराजडोंगरी : 22 मार्च 2020 सुकमा में कोराजडोंगरी के चिंतागुफा के पास नक्सली हमले में 17 जवान शहीद हो गए थे। शहीद होने वाले जवानों में डीआरजी के 12 जवान और एसटीएफ 5 जवान थे।

श्यामगिरी : 09 अप्रैल 2019 दंतेवाड़ा के लोकसभा चुनाव में माओवादियों के इस हमले में भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षाकर्मी भी मारे गये थे।

दुर्गपाल : 24 अप्रैल 2017 सुकमा जिले में सड़क निर्माण करने वालों अफसरों पर नक्सलियों ने अटैक कर दिया। हमले में (CRPF) के 25 जवान शहीद हो गए और 7 घायल हुए थे। ये 2017 का सबसे बड़ा हमला था।

सुकमा : 11 मार्च 2014 सुकमा जिले में झीरम घाटी के घने जंगलों में नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। इसमें सीआरपीएफ के 11 जवान, 4 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। 01 नागरिक की भी मौत

दंतेवाड़ा: 28 फरवरी 2014 नक्सल हमले में एक SHO समेत 6 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे।
दरभा: 25 मई 2013 बस्तर के दरभा घाटी में हुए इस माओवादी हमले में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग मारे गए थे।

दंतेवाड़ा: 04 जून 2011 दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर एंटी लैंड माइन वाहन विकल को उड़ा दिया था। इसमें 10 पुलिसकर्मी शहीद हो गए।।
धोड़ाई: 29 जून 2010 नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों ने हमला किया। पुलिस के 27 जवान मारे गए।
दंतेवाड़ा: 17 मई 2010 एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षाबल के जवानों पर माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था, जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे।
बीजापुर : 8 मई 2010 छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने पुलिस की एक गाड़ी को उड़ा दिया था, जिसमें भारतीय अर्धसैनिक बल के 8 जवान शहीद हुए थे।
ताड़मेटला: 6 अप्रैल 2010 बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग के लिए निकले थे, जहां संदिग्ध माओवादियों ने बारुदी सुरंग लगा कर 76 जवानों को मार डाला था।
मदनवाड़ा: 12 जुलाई 2009 राजनांदगांव के मानपुर इलाके में माओवादियों के हमले की सूचना पा कर पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने हमला बोला और उनकी हत्या कर दी।
उरपलमेटा: 9 जुलाई 2007 एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और ज़िला पुलिस का बल माओवादियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था। इस दल पर माओवादियों ने हमला बोला, जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए।
रानीबोदली: 15 मार्च 2007 बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को माओवादियों ने हमला किया और भारी गोलीबारी की। इसके बाद कैंप को बाहर से आग लगा दिया। इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए।
दंतेवाड़ा : 16 जुलाई 2006 नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में एक राहत शिविर पर हमला किया था, जहां कई ग्रामीणों का अपहरण कर लिया गया था। इस हमले में 29 लोगों की जान गई थी।

एर्राबोर : 28 फरवरी 2006 नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के
एर्राबोर गांव में लैंडमाइन ब्लास्ट किया, जिसमें 25 जवानों की जान गई थी।
किरंदुल : 19 फरवरी 2006 किरंदुल के पास हिरोली मैग्जीन पर हमला, 19 टन बारूद लूटा, सीआईएसएफ के 8 जवान शहीद

बीजापुर : 03 सितंबर 2005 बीजापुर के पदेड़ा-चेरपाल के पास 24 जवान शहीद

नारायणपुर : 20 फरवरी 2000 नारायणपुर के बाकुलवाही में एएसपी समेत 23 जवान शहीद, नक्सलियों ने बारूदी विस्फोट का पुलिस की 407 वाहन को उड़ा दिया था।