शनिवार, 25 जून 2016

ब्रिटेन का जनमत-यूरोपीय संघ से बाहर

ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह में जनता ने यूरोपीय संघ से अलग होने का जनमत दिया। इस जनमत से पूरी दुनिया में भूचाल आ गया। भारत सहित दुनिया भर के देशों के शेयर मार्केट गिर गया जिसे ब्लैकफ्राइडे कहा जा रहा है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने अपना इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे यूरोपियन संघ में रहने के पक्ष का प्रचार किया था। लेकिन जनमत डेविड के खिलाफ आ गया। 

ब्रिटेन यूरोपियन संघ अलग होने का मुख्य कारण मूल नागरिकता है। ब्रिटेन में बढ़ते प्रवासियों की संख्या के कारण रोजगार और अन्य अवसर कम हो चुके। जिससे वहां के लोगो में असंतोष हो रहा था। 

इस जनमत से पूरी दुनिया में चर्चा चल पड़ा की अब यूरोपियन युनियन के दिन पुरे हो गए है। नीदर लैंड में भी जनमत संग्रह की मांग होने लगी है। लेकिन शायद भारत के लिए अच्छा हो सकते है । भारत के ब्रिटेन में पढ़ने वाले विद्वार्थियो को लाभ होगा। नए व्यापार एवं अवसर अधिक मिलेगे।

आपातकाल - लोकतंत्र की हत्या


भारत के तत्कालीन प्रधानमत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को घोषित किया। 25 जून की आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद आपातकाल के आदेश पर दस्तखत कर दिए। 

इसके बाद आपातकाल का आतंक शुरू हुआ। सभी बड़े नेताओ को गिरफ्तार कर जेल में भर दिया। आपातकाल का विरोध करने वालों पर घोर अत्याचार किये गए। आम लोगों को संविधान प्रदत्त मौलिकअधिकारों का हनन किया गया। यह तक समाचार पत्र में सेंसरशिप लागु था जिन समाचार पत्र ने विरोध किया तो उसकी बिजली कट दी गई । सरकार किसी को भी बिना कारण से गिरफ्तार कर जेल भेजती। इतना तो अंग्रेज भी नहीं किये थे ऐसी अत्याचार ? 

इंदिरा गाँधी ने 1971 के चुनाव में भारी बहुमत से जीतकर केंद्र में कांगेस आई की सरकार बनी थी। लेकिन उनसे चुनाव में हारे रामबहादुर राय ने इलाहबाद कोर्ट में चुनाव के खिलाफ याचिका दायर की । राजबहादुर ने आरोप लगाया कि इंदिरा गाँधी ने चुनाव जितने के लिए अनुचित तरीके का इस्तेमाल किया। सरकारी मशनरी का दुरूपयोग किया, जिसे न्यायालय ने मानकर चुनाव को रद्द कर पुन लोकसभा का चुनाव कराने का आदेश दिया। इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी। इंदिरा गाँधी ने अपने विरोधियों को ख़त्म करने आपातकाल लागु कर लोकतंत्र की हत्या की थी।

बुधवार, 16 सितंबर 2015

पेटलावद हादसा या मानवता का नरसंहार -

झाबुआ के पेटलावद में हुए हादसे में अब तक सैकड़ों जाने जा चुकी है घायलों की संख्या भी सैकडो में है। घटना के बाद पेटलावद श्मसान जैसा हो गया है। टूटी चूड़िया, बिलखते बच्चे, माताओं के रुदन, तबाह हुआ परिवार, जिनका कोई भी कसूर नहीं था। निर्दोषो को मौत के मुह में पहुचने वाले में अधिकारी, अपराधी व राजनीति करने वाले ही दोषी है । जिन पर लोगों की सुरक्षा का था जिम्मा उन्ही लोग निक्कमे निकले। स्थानीय अधिकारी और जनता आमने सामने खड़ी है। अब प्रश्न उठता है कि जनता ने स्थानीय प्रशासनीय को लिखित में जानकारी दिया था । उस समय उचित कार्यवाही क्यों नही की गई।

सत्ता के साथ ही चोर बदमाश गुंडे शामिल हो जाते है। दूसरी बात की लोकतन्त्र में चुनाव में इन गुंडे चोर बदमाशों का उपयोग यही नेता कर अपनी सत्ता चलते है। यदि जनता ने सत्ता बदला तो यही लोग सत्ता के दलालों को पैसा के दम पर तथा पुराने लालची अधिकारियों से फिर से सत्ता की गलियों में पहुँच जाते है । नेता को भी पैसा चाहिए क्योंकि चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए । इन अपराधियो की पैठ फिर से सत्ता की गलियों तक हो जाती है। इसी के दम पर ये अपराधी झाबुआ कांड, नसबदी कांड और न जाने क्या क्या कांड करते है।

झाबुआ कांड भी इसी का नतीजा है। जमींन खरीद ठेकादारी, आदि में पैसा लगा और नेताओं अधिकारियों की सेवा करना । कुछ हुआ तो ऐसे अधिकारी नेता बचाव के लिए दीवार की तरह खड़े हो जाते है। झाबुआ कांड से पूर्व लिखित में शिकायत किया गया। लेकिन बीजेपी के स्थानीय नेता और अधिकारियों ने दबा दिया। यदि उसी समय कार्यवाही होती तो कम से कम 100 लोगो की जान बच जाती है। लेकिन घटना के तुरत बाद ही SDM  ने जानकारी दिया की उनके पास जिलेटिन रखने का लाइसेंस प्राप्त है इसी ही बात राज्य की DGP ने कहा कि उनके पास लायसेंस है लेकिन पहले होटल के सिलेंडर में विस्पोट हुआ । उसके बाद बाजू के गोदाम में हुआ। ऐसा इस लिए हुआ कि अपराधी नेता और अधिकारियों के गठबंधन हो तो सभी एक स्वर में बोलेंगे। 

मीडिया ने वहां के इतनी मौत पर सवेंदनशील दिखाते हुए स्थानीय लोगों से बातो को दिखाया। इस मामले में आम जनता का कहना कि जब लोगों ने प्रशासन को गोदाम में गैरकानूनी विस्फोटक रखे गये जानकारी दी गई, उचित कार्यवाही होनी चाहिए थी । लेकिन मामले को दबाया गया, इस मामले में स्थानीय नेताओं ने मामला को दबा में क्यों रूचि दिखाई । यह घटना एक प्रकार से दुर्घटना नहीं मानवता का नरसंहार है। इसका दोषी राज्य सरकार के मुखिया भी है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पेलावर दौर करने की हिम्मत दिखाई। लोगों ने घेर लिए नेता का जब आम जनता से संबध होता है जनता का कहना नेता मानता और नेता का कहना जनता भी मानती है। दौरे से शिवराज ने घटना की गंभीरता को समझा दिन भर प्रभावित लोगों से मिलते रहे। प्रभावित लोगों को मुआबजा 10 लाख कर दिया।

समस्या आर्थिक सहयोग करने या जाँच कमेटी या आयोग से नहीं हल होगा। लेकिन इस अपराध रूपी सांप का फन कुचलने से होगा। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक काम किया है। ऐसे अपराधी, सत्ता के दलालों को सत्ता के गलियारों में धुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इनदलालों को किसी नेता या अधिकारी के साथ दिखे तो उसकी ख़ैर नहीं। दिल्ली के सत्ता से बाहर हो चुके दलालो से राज्य सरकारे को प्रेरणा लेना चाहिए। जो व्यापम के बाद अब तक शिवराज सरकार ने नहीं किया है । इस दिशा में पार्ट्री ने भी अपनी राज्य की सरकार को निर्देश नहीं दिये है।अब सवेदनशील मामले को दबाने से नहीं बल्कि दोषी अपराधियों को ढूढकर दण्डित करने से है चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में छिपे हो।

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

जीवो को भी जीने का अधिकार है


जीवो को भी जीने का अधिकार है 

 भारत के दूसरे सबसे घनी आबादी वाले राज्य महाराष्ट्र में एक जैन पर्व के दौरान मीट की बिक्री पर प्रतिबंध का आदेश आया है। लेकिन सबसे ज्यादा कांग्रेस और भाजपा विरोधी दलों ने इसके विरोध में कहना शुरू कर दिया की सरकार तय करगे कि आम लोगो के खाने पीने में क्या खाए। जब महाराष्ट्र में पहले ही बीफ रखने या बेचने पर 5 साल तक जेल की सजा का प्रावधान है। हम महात्मा गाँधी के देश में आदि चार दिन के लिए मांस पर प्रतिबन्ध लगाया तो शांतिदूत धर्म के लोगो का जीवन खतरे में हो जायेगा। हमारे राष्ट्र में अनेक धर्मो के लोग रहते है हमें उनके भी धर्म के बारे में सोचा होगा तभी धर्मनिरपेक्षता सही हो सकता है न किसी को दोष देना।  
महाराष्ट्र में वर्ष 1970 दशक से जैन संप्रदाय के पर्व पर्युशान के अवसर पर बृहनमुंबई नगर निगम (बीएमसी) दो दिन के लिए प्रतिबन्ध लगता है, लेकिन इस बार चार दिनों के लिए मांस की बिक्री पर रोक लगा दी है। जैन संप्रदाय का यह त्योहार 10 से 28 सितंबर के बीच मनाया जाना है, पहले आठ दिन महापर्व के रूप में मनाए जाते हैं। 17 सितंबर से नगर में गणेश चतुर्थी का उत्सव शुरु हो जाएगा, जिसकी पूरे महाराष्ट्र में बहुत धूम रहती है। पिछले साल भी शहर में चार दिनों के लिए मीट की बिक्री पर मनाही थी आदेश में लिखा है कि इस मीट बैन की मांग विश्वमैत्री ट्रस्ट के अहिंसा संघ की ओर से आई थी। उनके पत्र में लिखा है, जैन धर्म अहिंसा के आदर्श पर आधारित है। केवल मुंबई में रहने वाले ही नहीं बल्कि इस दौरान बाहर से भी कई जैन मुनि मुंबई आते हैं। हम अपनी बात मनवाने के लिए किस हद तक जा सकते है इसमे इतना राजनीति क्यों होना चाहिए। 
भारत के संविधान में सभी पन्थो की आदर की बात कही गयी है लेकिन क्या किसी प्रथा के आदर करने के लिए चार दिन के लिए जीवो की हत्या बंद नहीं कर देना चाहिए।  इससे कितना फर्क पड़ेगा, जब हम दुसरो के धर्म की आदर नहीं करेगे तो हमारी धरम की आदर की अपेक्षा क्यों करते है? दूसरी बात क्या किसी जीव का जीने का अधिकार नहीं क्या? केवल भोजन के लिए ही जीवो की हत्या करनी चाहिए।  हमें भी सोचना चाहिए की प्रकृति ने सभी जीवो को एक दुसरे के अनुरूप बनाया है। कही न कही हम प्रकृति के नियम को तोड़ रहे है।  प्रकृति भी हमें इसकी सजा भी दे रहा है।  हिंसा से हिंसा ही फैलता है। आज अरब देशो में हो रहे मारकाट मचा हुआ है। वहा का जीवन वहा के अनुरूप है पर भारत में तो भोजन के लिए प्रकृति रूप से फल, फुल, अन्न लेकिन हम मांस के पीछे इतना क्यों भाग रहे है।   
 

शनिवार, 8 नवंबर 2014

गांवों के लिए पत्रकारिता -

गांवों के लिए पत्रकारिता -

           देश की चटुकार मीडिया गाव पर पत्रकारिता कभी नहीं किया और दिखाना भी नहीं आया। साल भर हीरों,हिरोइन के प्रेम संबध ,क्रिकेटरों के भदे फोटो, दारू, सिगरेट बिसलरी के बोतल के साथ दिया केवल भडवा गिरी रहा। लडकियों के कपडों पर रोचक कम्मेट से फुरसत नहीं मिलाता। जो समय बच गया उस समय पर केवल नेताओ पर मजाक उड़ना । देश की जनता को बताना कि हम जो कहे वही सही क्योंकि हम है लोक तन्त्र के चौथे स्तभ | जिसका वे लोग  दम?

          केवल एक मोदी ने इनकी औकात बताया। जयापुर जाकर दिखाया की अब ग्रामीण पत्रकारिता करों । गाव की प्रमुख समस्या क्या है । जब से जयापुर को गोद लेने की बात शुरू हुआ । तब से इलेक्ट्रानिक मीडिया के छुहारे स्ट्रेगर अपने लुटिया वाले कैमरे लेकर गाव में घूमना शुरू किये। गाँव की क्या समस्या है उन्हें पता ही नहीं क्योकि पत्रकारिता से नाता नहीं बल्कि दलाली करने से फुर्सत नहीं । शौचालय , पीने का पानी , स्कुल , सफाई आदि बिषय पर समाचार लिखे और दिखाई जाने लगी है। जिस गंभीरता से दिखाया जाना चाहिए था केवल कपिल कामेडी रिपोर्ट जैसा दिखाया गया। भारत अभी भी गांवों में बसता है। आदि गांवों में सुविधा दिया जाये तो शहरों में भीड़ कम होगा और गांवों का विकास होगा।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

सरगुजा की हड़िया

जब से लोग प्रकृति के साथ जीवन जीते रहे। प्रकृति भी उन्हों अनेकों उपहार में कुछ न कुछ देते रही है। इसी प्रकृति के बीच हमारे वनवासी आज भी जीने की कोशिश चल रहा है। प्रकृति के साथ यह उनको वर्षो पीढियों से संबध रहा है। वैसे तो वनवासियों का वनों से हजारों वर्षो से संबध है। इन वनों क बीच में अपने घर परिवार बसता है। इन वनों से अपने जीवन यापन हेतु आवश्यकतानुसार पेड़ पौधों से भोजन, लकड़ी तथा अन्य वस्तुओं का संग्रह करता आया है।  

वनों के बीच में रहता है अपने पालतू पशु चराना, जगलों के जानवरों का शिकार, खेती करना, मछली मरना आदि दिन भर के काम कर जब शाम वह घर पर आता है। शाम को परिवार और अपने समाज के साथ मिलकर अपनी लोक संस्कृति में पीना, खाना, गाता, बजाना और नाचता दिन भर का यही दिनचर्या है। यही दिनचर्या के साथ हजारों सालों से आनंद के साथ जीवन जीते आये है। अपने मनोरजन के लिए बजामस्ती के लिए  हड़िया को पीकर लोकगीतों के साथ खुब नाचना। आज भी वनवासियों ने इस परम्परा को बने  रखा है। पीने के लिए उसने इसी प्रकृति से कई पेड़ पोधों से रानू ( गोली ) बनाकर भात से हड़िया बनते है। शिकार कर जो भी जीव जतु मिले उसको पकाकरहँड़िया पीते हुए, सभी के साथ ( परिवार या समाज ) सामूहिक भोजन करते है। अपने जीवन को आनंद पूर्वक जीता है। साथ ही अपनी संस्कृति के रक्षा लिए भगवानजिसे उनका समुदाय मानता है उसकी श्रृध्दा, भक्ति, भाव  और विश्वास के साथ पूजा पाठ करते है। इस पूजा में ताजा हँड़िया को अर्पित कर सभी को प्रसाद के रूप में देते है। 

हँड़िया वनवासियों का प्रमुख पेय है। जशपुर के पाठ पर रहने वाले कोरवा लोग ही इसे अधिक उपयोग करते है। उनके लिए एक प्रकार का टानिक का काम करता है। शरीर के लिए आवश्यक पोषण तत्व की पूर्ति इसी से है। मतलब कहे तो हड़िया थोडा सा नशा करता है लेकिन शराब जैसा नशीला नहीं। हड़िया पीने वाला आदमी नशे ( मदहोश ) में नहीं रहता है। सरगुजा संभाग में किसी भी कोना में जाएगे आपको हँड़िया की परंपरा आपको मिलेगा। अतिथि के आने परउत्सव होने, घर पर मांगलिक कार्य तथा सामाजिक जीवन में हँड़िया ही अवश्य ही मिलेगा सरगुजा पूरी तरह आदिवासी बहुल रहने के कारण सभी जगह एक सा ही परम्पर रहा है। 

मतलब अल्कोहल से कतई नहीं है। बल्कि इसे उत्तर छत्तीसगढ़ के मूल आदिवासियों ने बहुत सोच समझ कर इजाद किया है। हड़िया एक मादक पेय होते हुए भी आदिवासियों की परम्परा और सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा रहा है। यह खास पेय तैयार होता है चावल, गेहू या मडुआ और रानू नाम की वनों में मिलाने वाले पेड़ पौधों के पत्तों एवं जड़ी को कूट कर पाउडर बनाया जाता है इसे चावल के आटे में मिलकर सफेद गोली छोटे छोटे गोली ( कांच की गोली कांचा) बनाया जाता है। इसलिए जिस रानू की उसमें कई जड़ी में हाई कैलोरी होती है, यह प्रोटीन का भी मात्र भी अच्छा है। चावलमडुआ और गेहूं के कारण फाइबर और कार्बोहाइड्रेट भी भरपूर मात्रा में मिलता है।

पहले धान को बर्तन में उबाला जाता है इसे फिर इसे पासकर ठंडा होने पर धान को कूट कर चावल बनाया जाता है फिर से चावल को पकाकर भात बनता जाता है गर्म भात को ठंडा किया जाता है घर में पुराना काला घडा ( पानी पिने वाला मटका ) भात का डाल देते हैं, जिस भात पसारना कहा जाता है। अब इस पसरे हुए न गर्म न ठंडे भात में रानू की गोली को पाउडर बनाकर ठीक से मिलाया जाता है। उसे घड़े में भर के मुंह को ढँक दिया जाता है। उसके बाद इस भात को फर्मेन्टेशन के लिए रख दिया जाता है। कुछ लोग चावल के साथ गेहूं को भी उबालते हैं। अगर मौसम सर्दियों का है तो कम से कम 6 दिन और अगर गर्मियां हैं तो कम से कम 3 दिन तक चावलों को ऐसे ही रखे रहने देते हैं। समय पूरा होने के बाद इसे बस्तर में लादा कहा जाता है चावल को घोटकर कर उसमें पानी मिलाया जाता है। अब हडिया तैयार हो गया है हड़िया के मूल रूप में पोषण का ध्यान रखा है। इसमें हाई कैलोरी होती है साथ ही यह प्रोटीन का भी मात्र भी अच्छा है। चावल, मडुआ और गेहूं के कारण फाइबर और कार्बोहाइड्रेट भी भरपूर मात्रा में मिलता है। चावलगेहूँ या मडुवा के भात से एक बार बना हड़िया 15 दिन तक इस्तेमाल किया जा सकता है। आदिवासी परिवारों में महीनें में दो बार हड़िया बनाने का चलन रहा है।

वनवासियों में परिवारों में कुल देवता की पूजा के लिए हड़िया सबसे चढाया जाता है। शादी-ब्याह, जन्म-मरण के अवसरों पर भी हड़िया का सेवन किया जाता है। अगर किसी को पीलिया है तो उस व्यक्ति को दिन में तीन बार हड़िया पिलाया जाता है, जानकार बताते हैं कि इससे केवल 3 दिन के भीतर की स्वास्थ्य में बेहतर सुधार दिखाई देता है। इसके अलावा हड़िया पीने से कब्ज से राहत, डायरिया से बचाव और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में भी मदद मिलती है। गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए दिन में दो बार हड़िया पिया जा सकता है। 

रथयात्रा के बाद बरसात शुरुआत होते पर हडिया पीना बंद कर दिया जाता है। वनवासियों में माना जाता है की भगवान आराम कर रहे है इसके बाद चतुर्मास तक वर्जित रहता है, देव उठनी एकादशी के कर्मापूजा से हडिया बनाना शुरू किया जाता है। दूसरी बात है आजकल हडिया को जल्दी बनाने के लिए यूरिया मिलाया जा रहा है यूरिया नाइट्रोजन का एक रूप है जो शरीर में जाने के बाद जहरीला हो जाता है। इसलिए आप अपने घर में ही हडिया बनाये आजकल कई व्यवसायी स्तर पर हडिया को बनाया जा रहा है जो की खतरनाक है अधिक लाभ कमाने के लिए लोग अधिक नशीला पदार्थ आक्सीटोसिन डाला जा रहा है जो की बहुत ही हानिकारक नशीला हो जाता है आप सभी नशीले पदार्थ से दूर रहे है   

जब यहाँ कोयला निकलना प्रारभ हुआ फिर बाहरी लोगों का आना शुरू हुआ। नए कालोनी कुछ स्थानों थोड़े बड़े नगर बन गये। इनमें रहने वाले लोग सरगुजिया ग्रामीण के लोग नहीं है। अधिकाशं बाहरी राज्य के लोग है, जिन्हें स्थानीय रीति परम्परा का ज्ञान नहीं है। उनके हडिया पर टिप्पणी करना ठीक नहीं है बल्कि उनके परम्परा का सम्मान करना चाहिए क्योंकि आप उनकी धरती पर है


सहयोग- (11) करन साय | Facebook 

लिंक - http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2013/haat_bazar.htm

http://www.anthrobase.com/Txt/S/Satpathy_N_Satpathy_R_01.htm

बुधवार, 17 सितंबर 2014

मोदी जी का जन्मदिवस

मोदी जी का जन्मदिवस

आज सुबह देश के प्रधानमंत्री अपनी माँ से आशीर्वाद लेने भाई के घर पहुचे । माँ घर से बाहर आकर बरामदे में मोदी के साथ बैठी और दुलार से अपने बेटे को जन्मदिनपर यशस्वी होने की आशीर्वाद दी। नेग के रूप में जन्मदिवस पर अपने तरफ से पांच हजार रूपये भी दी जिसे मोदी जी बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए दान दे दिया ।


मोदी जी सभी मीडिया को वह अदभुत नजारा दिखा दिया। एक देश के प्रधानमंत्री अपना जन्मदिन सादगी पूर्वक मनाया । उन लोगों के लिए एक सबक होना चाहिए जन्मदिन के नाम पर अनाब सनाक खर्च कर देते है। जब भी मोदी अपने माँ से मिलने जाते है मीडिया के लिए एक बड़ी खबर होती है । दुनिया के किसी भी नेता की माँ से मिलने की खबर एक बड़ी खबर बनी हो । आज मीडिया के लिए केवल सरकार के लोगों की चापलूसी खबर ही मिलती है। लेकिन एक राष्ट्र के प्रधानमंत्री जब अपनी साधारण माँ से मिलने मामूली आदमी बनकर जाते है तो दुनिया के लिए एक बड़ी खबर बन जाती है।



माँ भी साधारण जैसा अपनी ही माँ हो । इसी साधारण माँ से दुनिया भर के नेता मिलने आ रहे है । अभी तक किसी ने भी नहीं सोचा होगा की एक नेता ने अपनी माँ का सम्मान इतना बढाया हो। मोदी जी ने अपनी माँ का सम्मान दुनिया में बढ़ाया । हम सभी के लिए प्रेरणादायक हो ।