बुधवार, 25 सितंबर 2019

कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद बड़ा खतरा है और भारत-अमेरिका एकजुट होकर इससे लड़ेंगे - राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में 'हाउडी मोदी' (Howdy Modi) कार्यक्रम को संबोधित करते हुई कहा कि - भारत-अमेरिका की दोस्ती की मजबूती का जिक्र करते हुए कहा कि हम दोनों मिलकर आतंकवाद की इस चुनौती का मिलकर मुकाबला करेंगे उन्होंने कहा ‘‘हम निर्दोष नागरिकों की कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद के खतरे से रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’’ अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों द्वारा आयोजित  'हाउडी मोदी' (Howdy Modi) में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा किये। हाउडी मोदी कार्यक्रम में अपने भाषण में इस्लामिक आतंकवाद का जिक्र करते हुए कड़ा प्रहार किया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भारत और अमेरिकादोनों देश मानते हैं कि अपने समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए हमें अपनी सीमाओं की सुरक्षा करनी होगी। उन्होंने कहा कि मेरे प्रशासन ने अब तक इसी पर काम किया है। जो हमारे देश के लिए खतरा हैंउन्हें अमेरिका में प्रवेश न मिलेयह सुनिश्चित किया जा रहा है। सीमा की सुरक्षा भारत के लिए भी इतनी ही महत्वपूर्ण है। हाउडी मोदी कार्यक्रम समारोह फुटबाल स्टेडियम में होने जा रहा है यह अमेरिका के सबसे बड़े पेशेवर फुटबॉल स्टेडियम में से एक है इसका आयोजन एनजीओ टेक्सास इंडिया फोरम (टीआईएफ) कर रहा है 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब से इस्लामिक आतंकवाद की बात की है तब से दुनिया में एक प्रकार का हलचल मचा हुआ है  भारत इस्लामिक आतंकवाद से तब से जूझ रहे हैं जब मोहम्मद बिन कासिम भारत आया था आज तक भारत में इस्लामिक आतंकवाद के कारण करोड़ों हिंदुओं की जान गई, तलवार के नोक से उनका धर्मातरण किया गया है हिन्दुओं के मंदिर को तोप से हमला किया गया, उन्हें मस्जिद बनाया गया लेकिन यह आतंकवाद पर दुनिया के ध्यान तब गया जब 11 सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड टावर सेंटर पर आतंकी हमला हुआ आज अमेरिका ने भी माना कि पूरी दुनिया को अब इस्लामिक आतंकवाद से खतरा है इस वर्ल्ड ट्रेड की घटना के बाद आतंकवाद के सफाए के लिए अमेरिका ने कमर कसा लेकिन अमेरिका की कमर कसी उतनी सफल नहीं रही, वह केवल अपने अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहे लेकिन जब भी भारत पाकिस्तान की तरफ इशारा करता है अमेरिका इसको स्वीकार नहीं कर रहा था अमेरिका अफगानिस्तान तथा इराक में फंसा हुआ था, लेकिन 2014 के चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी भारत की सत्ता संभाले और जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में अपनी पहली मीटिंग में जाकर कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और वैसे ही आतंकवाद ही आतंकवाद होता है आतंकवाद कोई अच्छा या बुरा नहीं होता और इस किसी भी प्रकार के आतंकवाद का हमें पुरजोर विरोध करना चाहिए इसके लिए कुछ भी करें क्योंकि आने वाली पीढ़ियां इस आतंकवाद के कारण बर्बाद हो रही है 

आज रविवार को मोदी कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रंप ने यही बात दोहराई कि आतंकवाद के कारण आने वाली पीढ़ी आने वाले लोग बहुत सारे निर्दोष नागरिक की हत्या हो जा रही है उनका जीवन खतरे में पड़ रहा है, आने वाली पीढ़ियों के जीवन खतरे में पड़ रहे हैंइसलिए यह इस्लामिक आतंकवाद खत्म होना चाहिए और भारत और अमेरिका की दोस्ती इस आतंकवाद के चुनौती को डट के मुकाबला करेगी




रविवार, 22 सितंबर 2019

इस्लामिक देशों के मुकाबले भारत में मुसलमान ज्यादा भाग्यशाली हैं- मार्क टुली


भारत में बसे बीबीसी के पूर्व जानेमाने पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक मार्क टुली ने कहा है कि इस्लामिक देशों के मुकाबले भारत में मुसलमान अधिक भाग्यशालीहैं, क्योंकि यहां वे किसी भी इस्लामिक परंपरा की उपासना कर सकते हैं। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में जहां वे रहते हैं, वहां तब्लीगी जमात का मुख्यालय है और वे बेहद सख्त और रूढ़िवादीहैं।

बीबीसी के लिए पत्रकार के रूप में पुन भारत आ कर भारतीय संस्कृति में रचे बसे ब्रिटिस मूल के 80 बसंत के अनुभवी पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक मार्क टुली है उन्होंने भारत के कई बिषयों में पुस्तक लिखे है  


भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर भावुक हुए कश्मीरी पंडित, बोले- कश्मीर पर हर फैसले में हम आपके साथ



अमेरिका में रहने वाले कश्मीरी पंडित भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर भावुक हो गए। सात दिन के अमेरिकी दौरे पर है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ह्यूस्टन में पहला दिन अमेरिकी सीईओ से लेकर भारतीय समुदाय के लोगों के साथ मुलाकातों और बातों में बीता। आज भारतीय समुदाय कश्मीर पंडितों के लोगों पीएम मोदी से मिलकर काफी खुशी महसूस कर रहे थे।  कश्मीरी पंडितों से मिलने के दौरान पीएम मोदी भी भावुक नजर आए। कश्मीरी पंडितों के समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सुरिंदर कौल ने उनका हाथ चूम लिया। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले का स्वागत करते हुए पीएम मोदी से कहा कि जम्मू कश्मीर के विकास के लिए जाने वाले हर कदम में आपके साथ हैं।

सुरिंदर कौल ने कहा कि प्रधानमंत्री ने हमसे कहा कि आपने बहुत कुछ सहा है और हम साथ मिलकर नया कश्मीर बनाएंगे। हमारे युवाओं ने उन्हें वह संदेश दिए जो समुदाय ने उनके लिए तैयार किए हैं। उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। कौल ने कहा कि हमने उन्हें सात लाख कश्मीरी पंडितों की तरफ से यह ऐतिहासिक फैसला लेने की वजह से धन्यवाद कहा। हमने उन्हें आश्वासन दिया कि हमारा समुदाय सरकार के साथ मिलकर उस कश्मीर के सपने को पूरा करेगाजहां शांति होगीविकास होगा और सभी खुशहाल होंगे। 
      कैसे हुआ कश्मीर का जन्म और कैसे पड़ा इसका ये नाम-
हजारों वर्ष पूर्व कश्यप ऋषि के द्वारा बसाया गया था इसलिए कश्मीर को कश्यप ऋषि के नाम से पुकारने के कारण कश्मीर नाम पड़ा तभी कश्मीर के मूल निवासी सारे हिन्दू थे। कश्मीरी पंडितो की संस्कृति5000 साल पुरानी है और वे ही कश्मीर के मूल निवासी हैं। प्राचीनकाल से ही कश्मीर महर्षि कश्यप के नाम पर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालना रहा है। ब्रह्म से ब्रह्माब्रह्मा से मरीचिमरीचि से कश्यप ऋषि ही कश्मीर के मूल निर्माता थे। पुराणों में ऋषि कश्यप का उल्लेख है की कश्मीर के निर्माण के लिए उल्लेखित है। उनके साथ-साथ भगवान शिव की पत्नी देवी सती का नाम भी पुराणों में लिया गया है। 

प्राचीनकाल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालना रहा है। माना जाता है कि यहां पर भगवान शिव की पत्नी देवी सती रहा करती थीं और उस समय ये वादी पूरी पानी से ढकी हुई थी। यहां एक राक्षस नाग भी रहता थाजिसे वैदिक ऋषि कश्यप और देवी सती ने मिलकर हरा दिया और ज्यादातर पानी वितस्ता जो आज झेलम नदी के नाम से जानी जाती है उसके रास्ते बहा दिया। इस तरह इस जगह का नाम सतीसर से कश्मीर पड़ा। इससे अधिक तर्कसंगत प्रसंग यह है कि इसका वास्तविक नाम कश्यपमर अथवा कछुओं की झील था। इसी से कश्मीर नाम निकला।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस विस्तृत घाटी के स्थान पर कभी मनोरम झील थी जिसके तट पर देवताओं का वास था। एक बार इस झील में ही एक असुर कहीं से आकर बस गया और वह देवताओं को सताने लगा। त्रस्त देवताओं ने ऋषि कश्यप से प्रार्थना की कि वह असुर का विनाश करें। देवताओं के आग्रह पर ऋषि ने उस झील को अपने तप के बल से रिक्त कर दिया। इसके साथ ही उस असुर का अंत हो गया और उस स्थान पर घाटी बन गई. कश्यप ऋषि द्वारा असुर को मारने के कारण ही घाटी को कश्यप मार कहा जाने लगा यही नाम समय के साथ-साथ बदल कर कश्मीर हो गया निलमत पुराण में भी ऐसी ही एक कथा का उल्लेख है कश्मीर के प्राचीन इतिहास और यहां के सौंदर्य का वर्णन कल्हण रचित राज तरंगिनी में बहुत सुंदर ढंग से किया गया है

यहां का प्राचीन विस्तृत लिखित इतिहास है राजतरंगिणीजो कल्हण द्वारा 12वीं शताब्दी ई. में लिखा गया था। तब तक यहां पूर्ण हिन्दू राज्य रहा था। यह अशोक महान के साम्राज्य का हिस्सा भी रहा। लगभग तीसरी शताब्दी में अशोक का शासन रहा था। तभी यहां बौद्ध धर्म का आगमन हुआजो आगे चलकर कुषाणों के अधीन समृध्द हुआ था। उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के अधीन छठी शताब्दी में एक बार फिर से हिन्दू धर्म की वापसी हुई। उनके बाद ललितादित्या हिन्दू शासक रहाजिसका काल 697ई. से 738 ई. तक था। अवन्तिवर्मन ललितादित्या का उत्तराधिकारी बना। उसने श्रीनगर के निकट अवंतिपुर बसाया। उसे ही अपनी राजधानी बनायाजो एक समृद्ध क्षेत्र रहा। उसके खंडहर अवशेष आज भी शहर की कहानी कहते हैं। यहां महाभारत युग के गणपतयार और खीर भवानी मन्दिर आज भी मिलते हैं। गिलगिट में पाण्डुलिपियां हैंजो प्राचीन पाली भाषा में हैं। उसमें बौद्ध लेख लिखे हैं। त्रिखा शास्त्र भी यहीं की देन है। यह कश्मीर में ही उत्पन्न हुआ। इसमें सहिष्णु दर्शन होते हैं। चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से से सूफी इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा,त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता हैजो कश्मीरियत का सार है। भारतीय लोकाचार की सांस्कृतिक प्रशाखा कट्टरवादिता नहीं है।

मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ मुसलमान शाह और राज्यपाल हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे। 14वीं शताब्दी में तुर्किस्तान से आये एक क्रूर आतंकी मुस्लिम दलुचा ने 60,000लोगो की सेना के साथ कश्मीर में आक्रमण किया और कश्मीर में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना की। दुलुचा ने नगरों और गाँव को नष्ट कर दिया और हजारों हिन्दुओ का नरसंघार किया। बहुत सारे हिन्दुओ को जबरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। बहुत सारे हिन्दुओ ने जो इस्लाम नहीं कबूल करना चाहते थेउन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली और बाकि भाग गए या क़त्ल कर दिए गए या इस्लाम कबूल करवा लिए गए। आज जो भी कश्मीरी मुस्लिम हैउन सभी के पूर्वजो हिन्दू थे आंतकियों के अत्याचारों के कारण जबरदस्ती मुस्लिम बनाया गया था। भारत पर मुस्लिम आक्रमण विश्व इतिहास का सबसे ज्यादा खुनी कहानी है। ज़ैनुल-आब्दीन का 1420-1470 तक राज्य रहा था। सन 1589 में यहां मुगल का राज हुआ। यह अकबर का शासन काल था। मुगल साम्राज्य के विखंडन के बाद यहां पठानों का कब्जा हुआ। यह काल यहां का काला युग कहलाता है। फिर 1814 में पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह द्वारा पठानों की पराजय हुई व सिख साम्राज्य आया।

अंग्रेजों द्वारा सिखों की पराजय 1846 में हुईजिसका परिणाम था लाहौर संधि। अंग्रेजों द्वारा महाराजा गुलाब सिंह को गद्दी दी गई जो कश्मीर का स्वतंत्र शासक बना। गिलगित एजेन्सी अंग्रेज राजनैतिक एजेन्टों के अधीन क्षेत्र रहा। कश्मीर क्षेत्र से गिलगित क्षेत्र को बाहर माना जाता था। अंग्रेजों द्वारा जम्मू और कश्मीर में पुन: एजेन्ट की नियुक्ति हुई। महाराजा गुलाब सिंह के सबसे बड़े पौत्र महाराजा हरि सिंह1925 ई. में गद्दी पर बैठेजिन्होंने 1947 ई. तक शासन किया। भारत की स्वतन्त्रता के समय महाराजा हरि सिंह यहाँ के जम्मू कश्मीर लदाख शासक थेजो अपनी रियासत को स्वतन्त्र राज्य रखना चाहते थे। कश्मीरी पंडित और राज्य के ज़्यादातर मुसल्मान कश्मीर का भारत में ही विलय चाहते थेक्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। 


पाकिस्तान को ये बर्दाश्त ही नहीं था कि कोई मुस्लिम-बहुमत
 प्रान्त भारत में रहे । इससे उसके दो-राष्ट्र सिद्धान्त को ठेस लगती थी। 1947-48 में पाकिस्तान ने कबाइली और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और क़ाफ़ी हिस्सा को हथिया लिया। उस समय प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने मोहम्मद अली ज़िन्ना से विवाद जनमत-संग्रह से सुलझाने की पेशक़श कीजिसे जिन्ना ने उस समय ठुकरा दिया क्योंकि उनको अपनी सैनिक कार्रवाई पर पूरा भरोसा था। जम्मू कश्मीर के महाराजा श्रीमंत हरिसिंह ने 26 अक्तूबर 1948 को भारत में कुछ शर्तों के तहत विलय संधि हस्ताक्षर कर भारत में विलय कर दिया। भारतीय सेना ने जब राज्य का काफ़ी हिस्सा बचा लिया थातब इस विवाद को संयुक्त राष्ट्र में ले गया।






गुरुवार, 12 सितंबर 2019

छत्तीसगढ़ का 'टाइगर ब्वाय' नाम चेंदरू - “ द बॉय एंड द टाइगर ”




वैसे हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन कद के अभावों में विलुप्त हो जाते है, ऐसा ही चेदरू मांडवी भी था। चेंदरू मंडावी छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले से 2 किमी पर गाँव गढ़बेंगाल का रहने वाला मुरिया जनजाति का यह 10 वर्षीय बड़ा ही वीर बहादुर लड़का था। जैसा कि शकुंतला दुष्यंत के पुत्र भरत जन्म अवस्था में ही कश्यप ऋषि के आश्रय में  ही जन्म से लेकर बाल्यकाल बिता रहा था। ऐसे वीर भरत बाल्य अवस्था में शेरों के साथ खेला करते थे। इसी वीर बालक भरत के नाम से भारत वर्ष पड़ा है। वैसे ही बस्तर का यह लड़का चेदरू मांडवी शेरों के साथ खेलता था। 1957 में चेंदरू पर 75 मिनट की निर्माता अरने सक्सडोर्फ ने फ़िल्म बनाई द फ्लूट एंड द एरो जिसे भारत में नाम दिया गया “द जंगल सागा। फ़िल्म अंतराष्ट्रीय स्तर पर खूब सफल रही। 1957 में बनी इस फ़िल्म को 1958 के कांस फ़िल्म फेस्टिवल में भी जगह मिली। चेंदरू द टायगर बाय के नाम से मशहुर चेंदरू पुरी दुनिया के लिये किसी अजुबे से कम नही था। बस्तर के मोगली नाम से चर्चित चेंदरू पुरी दुनिया में 60 के दशक में बेहद ही मशहुर था। चेंदरू के जीवन का दिलचस्प पहलू था उसकी टाइगर से दोस्ती, वह भी रियल जंगल के। दोस्ती भी ऐसी कि दोनों हमेशा साथ ही रहते थे, खाना, खेलना, सोना सब साथ-साथ। बस्तर के जंगल से हॉलीवुड का स्टार और फिर गुमनामी, की कहानी फिल्मी है - चेदरू मांडवी की 
चेदरू मंडावी जो कि खास बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र में रहने वाले एक मुरिया जनजाति समाज से था उसके पिता और दादा एक कुशल शिकारी थे तथा जीवन यापन के लिए खेतीबाड़ी किया करते थे। एक दिन शिकार के लिए गए थे उन्हों बाघ का बच्चा मिला उसे बांस की टोकरी में रखकर घर ले आये। वह चेंदरू के लिये एक तोहफा लाये, तोहफा एक दोस्ती का जिसने चेंदरू का जीवन बदल दिया। बांस की टोकरी में छुपे तोहफे को देखने चेंदरू बड़ा ही उत्साहित था जब टोकरी खुली, चेंदरू ने अपने सोच से परे कुछ पाया। टोकरी में था एक बाघ का बच्चा। जिसे देख चेंदरू ने उसे गले लगा लिया और इस मुलाकात से बाघ और चेंदरू की दोस्ती की शुरूआत हो गई।
चेंदरू ने उस बाघ का नाम रखा टेम्बू। टेम्बू और चेंदरू साथ गांव में घूमते, जंगल जाते, नदी में मछलियां पकड़ते और जंगल में कभी तेंदुए मिल जाते तो वह भी इनके साथ खेलने लगते। जब चेंदरू और टेम्बू रात को घर आते, चेंदरू की माँ उनके लिये चावल और मछली बना कर रखती। दोस्ती का यह किस्सा गांव गांव फैलने लगा और एक दिन विदेश में स्वीडन तक पहुच गया, स्वीडन के मशहूर डायरेक्टर अरने सक्सडोर्फको जब यह किस्सा पता चला, वह सीधा बस्तर आ पहुचे।
सोचिए एक ऐसा दृश्य जहाँ एक मनुष्य और एक बाघ एक दूसरे के दोस्त हो, दोनों में कोई बैर नही। जिनकी सुबह साथ मे होती है और रात भी। कोई भी ऐसा किस्सा सुन ले तो अपनी आंखों से देख कर ही दम भरे, और अब ऐसा दृश्य डायरेक्टर अरने सक्सडोर्फके सामने था। जिसे देख उस दृश्य को उन्होंने पूरी दुनिया को दिखाने का फैसला कर लिया।
अरने सक्सडोर्फ ने फ़िल्म बनाई द फ्लूट एंड द एरो जिसे भारत मे नाम दिया गया “द जंगल सागा। फ़िल्म अंतराष्ट्रीय स्तर पर खूब सफल रही। 1957 में बनी इस फ़िल्म को 1958 के कांस फ़िल्म फेस्टिवल में भी जगह मिली। फ़िल्म की शूटिंग के समय अरेन सक्सडोर्फ और चेंदरू में एक रिश्ता सा बन गया। अरने सक्सडोर्फ के शब्द थे कि वह चेंदरू को अपने बेटे की तरह देखते थे। फ़िल्म की वजह से चेंदरू और टेम्बू कि कहानी दुनिया ने देखी, अब दुनिया चेंदरू को करीब से देखने की लालसा में थी। अरेन भी चाहते थे कि चेंदरू वो जगह देखे जहाँ से वह आये है, तो उन्होंने चेंदरू को स्वीडन ले जाने का सोचा। और वो उसे स्वीडन ले गए।

स्वीडन चेंदरू के लिये एक अलग ही दुनिया थी, अरेन ने उसे एक परिवार का माहौल दिया, उन्होंने उसे अपने घर पर ही रखा और अरेन की पत्नी अस्त्रिड सक्सडोर्फने चेंदरू की अपने बेटे की तरह देखरेख की। अस्त्रिड एक सफल फोटोग्राफर थी, फ़िल्म शूटिंग के समय उन्होंने चेंदरू की कई तस्वीरें खीची और एक किताब भी प्रकाशित की चेंदरू द बॉय एंड द टाइगर। स्वीडन में चेंदरू करीब एक साल तक रहा, उस दौरान उसने बहुत सी प्रेस कॉन्फ्रेंस, फ़िल्म स्क्रीनिंग की, और अपने चाहने वालो से मिला। दुनिया उतावली थी उस बाल कलाकार से मिलने जिसकी दोस्ती एक बाघ से है, जो एक बाघ के साथ रहता है। पूरा विश्व अब चेंदरू को टाइगर बॉय के नाम से जानने लगा। एक साल बाद चेंदरू स्वदेश वापस लौटा। मुम्बई पहुँच कर चेंदरू की तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात हुई, उन्होंने चेंदरू को पढ़ने के लिये कहा, पर चेंदरू के पिता ने उसे वापस बुला लिया। चेंदरू अब बस्तर के अपने गांव वापस आ गया, पर वापस आने के कुछ दिनों बाद टेम्बू चलबसा। चेंदरू उदास रहने लगा पर वह धीरे धीरे पुरानी ज़िन्दगी में लौटा और फिर गुमनाम हो गया। 


वर्षो बीत गए, कुछ टीवी पर बीमार चेंदरू के बारे में बस समाचार में ही है जब चेंदरू मंडावी को लकवा मारने पर अस्पताल पहुचा बीमार चेंदरू की टीवी और समाचार पत्रों में केवल खबर बस रह गया। कोई सरकार या सामाजिक संस्था ने भी रूचि नहीं दिखाया। राज्य सभा टीवी पर राजेश बादल का 20 मिनट का रिपोर्टिंग किया हुआ कार्यक्रम है 1996 में बना JungleDreams नाम से एक डाक्युमेटरी ही जिसे प्रमोद माथुर बनाया और Youtube पर शेयर किया है। हमे देखना चाहिए और अपने बच्चों को भी साथ में बताना चाहिए की वन्य जीव हमारे लिए खतरनाक नहीं है, बल्कि पूरक है मानव जाती का धर्म है इस जंगल को बचाना हमारी जिम्मेदारी है जंगल रहेगा तो जीव भी रहेगे हो सकता है, कि कोई चेंदरू मोगली कोई टार्जन भी फिर दे आये  



जब चेंदरू मंडावी नाम व्यक्ति को 23 सितंबर 2011 लकवा की बीमारी से जगदलपुर हास्पिटल में भर्ती होता है। तभी स्थानीय मीडिया तथा समाचार पत्रों के द्वारा लोगों को पता चलता की चेंदरू मंडावी के बारे में, उसमे से मै भी हूँ। ऐसा भी व्यक्तित्व होते हुए भी हमने खो दिया है। खानापूर्ति के लिए रायपुर में एक प्रतिमा लगा कर इतिश्री कर दिया है। यदि कोई राजनीतिक या भड़वे कलाकार होता तो कई फिल्में बन जाते। लेकिन एक निडर बालक पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भर है। राज्य सभा टीवी पर भी उसी डॉक्यूमेंट्री पर रिपोर्टिंग भर है। आज जंगल में जानवर और मनुष्य पर संघर्ष सभी जगह दिखा जाता है, लेकिन पूरकता नही। इस कमी को चेंदरू मंडावी ने दोस्ती के साथ पूरा करने की कोशिश ही है....



साभार -https://kosalkatha.com/chendru-mandavi-bastar-chhattisgarh/
https://www.bbc.com/hindi/india/2013/09/130831_tiger_boy_chandru_fma

रविवार, 1 सितंबर 2019

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा - पाकिस्तानी नेता अल्ताफ हुसेन



सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा उर्दू भाषा में लिखी गई देशप्रेम की एक ग़ज़ल है अक्सर भारत के युवा इसे गुनगुनाते है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश राज के विरोध का प्रतीक बनी जिसे आज भी देश-भक्ति के गीत के रूप में भारत में गाया जाता है। इसे अनौपचारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इस गीत को प्रसिद्ध शायर मुहम्मद इक़बाल ने १९०५ में लिखा था और सबसे पहले सरकारी कालेज, लाहौर में पढ़कर सुनाया था। यह इक़बाल की रचना बंग-ए-दारा में शामिल है। उस समय इक़बाल लाहौर के सरकारी कालेज में व्याख्याता थे। उन्हें लाला हरदयाल ने एक सम्मेलन की अध्यक्षता करने का निमंत्रण दिया। इक़बाल ने भाषण देने के बजाय यह ग़ज़ल पूरी उमंग से गाकर सुनाई। 

जब से भारत सरकार ने कश्मीर से धारा 370 हटाया है। तब से एक पाकिस्तानी नेता ने भारत की तारीफ में एक गाना सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारागाया है, जो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है। गाना गाने वाले शख्स पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टी मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंटके संस्थापक हैं। जिनका नाम अल्ताफहुसैन है। कराची शहर में हुसैन की आज भी अच्छी-खासी पकड़ है। अल्ताफ की पहचान पाकिस्तान में एक तेज-तर्रार नेता के रूप में हैं। पाकिस्तान से अल्ताफ को निर्वासित कर दिया गया है। अल्ताफ हुसैन फिलहाल लंदन में रह रहे हैं।


कुछ दिन पहले ही लंदन में रह रहे अल्ताफ हुसैन ने कहा था कि कश्मीर के लोगों से पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तान सरकार पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना 72 सालों से कश्मीर के लोगों को धोखा दे रही है।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

दामोदर गणेश बापट जी को कुष्ठ रोगियों के निस्वार्थ, सेवा भाव और समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने 2018 में पद्मश्री से सम्मानित किया


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी एक रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। उस स्टेशन पर स्टेशन मास्टर के रूप में गणेश विनायक बापट नाम का नवयुवक था। उसने डॉक्टर हेडगेवार को पहचान गया और कहा कि आप ही नागपुर के डॉ हेडगेवार है। उन्होंने कहा मैं गणेश विनायक बापट हूं। आप ने मुझे पैसा देकर आर्थिक सहयोग किया था। आज मैं इस रेलवे स्टेशन पर नौकरी कर रहा हूँ। यह नौकरी आप के उस सहयोग से मुझे मिल गई है, आज मेरे दांपत्य जीवन का पहला दिन है। आप मेरे साथ मेरे घर चलिए और मेरा आतिथ्य स्वीकार करिए। 
डॉ हेडगेवारजी के आतिथ्य स्वीकार की है और उनके निवास स्थान पहुँचे। उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई गणेश बापट ने भोजन बनाई और वह भोजन डॉक्टर हेडगेवार ने प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण किया। इन्ही दांपत्य से तीसरी संतान 29 अप्रैल 1935 जन्म लिया, जिसका नाम- श्री दामोदर गणेश बापट था, जिन्होंने अपना जीवन संघ के प्रचारक के रूप में समर्पित कर दिया। 52 वर्षों तक समाज के साथ चांपा कुष्ठ आश्रम में रहकर कुष्ठ रोग से ग्रसित रोगी की, उन्होंने निस्वार्थ भाव से सेवा किया। 18 अगस्त 2002 महामानव ने अपना देह मेडिकल कॉलेज बिलासपुर के छात्रों लिए छोड़ कर चले गए।

श्री दामोदर गणेश बापट मूल रूप से ग्राम पथरोट, जिला अमरावती, महाराष्ट्र के निवासी थे बचपन से ही उनके मन में सेवा की भावना कूट-कूटकर भरी थी। यही वजह है कि वे करीब 9 वर्ष की आयु से आरएसएस के स्वयसेवक व कार्यकर्ता बन गए। दामोदर बापट ने नागपुर से बीए और बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद बापट ने पहले कई स्थानों में नौकरी की, लेकिन उनका मन नहीं लगा। उन्हें पता चला की बाला साहेब देशपांडे जशपुर में वनवासियों के लिए उत्थान के लिए कार्य करते है, वे छत्तीसगढ़ के वनवासी कल्याण आश्रम जशपुरनगर पहुंचे और कल्याण आश्रम के कार्यकर्त्ता के रूप में बच्चों को पढ़ाने लगे। नागपुर जाते समय उन्हें पता चला की चाम्पा के पास कुष्ठ रोगियों का आश्रम है, वे देखने के लिए चले गए   

छत्तीसगढ़ के चांपा रेल्वे स्टेशन से आठ किलोमीटर दूर ग्राम सोठी में भारतीय कुष्ठ निवारक संघ द्वारा संचालित आश्रम में कुष्ठ रोगियों के लिए सेवाकार्य चलता है। भारतीय  कुष्ठ आश्रम की शुरुआत 1962 में कुष्ठ पीड़ित पूज्य सदाशिवराव गोविंदराव कात्रे ने की थी। 1972 में यहां वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता गणेश बापट पहुंचे और कात्रे जी के साथ मिलकर उन्होंने कुष्ठ पीड़ितों के इलाज और उनके सामाजिक आर्थिक पुनर्वास के लिए सेवा के साथ कई कार्यक्रमों की शुरुआत भी की। कुष्ठ रोग के प्रति लोगो को जागृत करने के अलावा कुष्ठ रोगियों की सेवा करने का कार्य प्रमुख रूप से दामोदर बापट ने किया है। 

दामोदर बापट जी के कुष्ठ रोगियों के निस्वार्थ सेवा भाव और समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने 2018 में पद्मश्री से सम्मानित किया है। भारत के राष्ट्रपति महामहिम कोविंद ने पद्मश्री से राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया


रविवार, 25 अगस्त 2019

आज शिक्षा मनी मेकिंग मशीन बन गई - नरेन्द्र मोदी


नरेंन्द्र मोदी आज पुणे के फर्ग्युसन कालेज में छात्रों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, हमारी शिक्षा मेन मेकिंग थी लेकिन उसे मनी मेकिंग बना दिया गया है। मोदी ने कहा कि कुछ लोग पावर चाहते हैं जबकि मैं इम्पावरमेंट चाहता हूं। नरेंन्द्र मोदी ने केन्द्र सरकार के खिलाफ कि कहा, लेकिन उसकी नीतियों की आलोचना कहा कि यह भारत का दुर्भाग्य है कि एक भी पड़ोसी उसका दोस्त नहीं है।

सरकार की शिक्षा नीति पर मोदी ने कहा कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है, जो युवाओं की ताकत का इस्तेमाल कर सके। ओलिंपिक गेम्स के बाद हम हर बार निराश होते हैं कि सवा अरब लोगों का देश चंद गोल्ड मेडल नहीं ला सकता, लेकिन शिक्षा को खेलों से जोड़ने की कोई कोशिश नहीं हो रही। मोदी ने कहा, अगर सैनिकों को अच्छे से टैनिंग दी जाए तो पांच सात मेडल तो वे ही जी लाएं।

नरेंन्द्र मोदी ने कहा कि देश में निराशा का माहौल है, देश का युवा कुछ करना चाहता है, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। मोदी ने कहा,कि युवा न सिर्फ भारत को बल्कि पूरी दुनिया को निराशा के माहौल से बाहर निकालेंगे। भारत में गजब की ताकत है। यह देश 1,200 साल की गुलामी के बाद भी जिंदा है। सीना तानकर खड़ा है। विश्वविद्यालयी शिक्षा के 2,600 साल के इतिहास में भारत 1,800 साल तक दुनिया का सरताज रहा। सिर्फ गुलामी के 800 सालों में इसका नाश हुआ। पूरी दुनिया से लोग यहां पढ़ने आते थे।

अपने भाषण की शुरुआत में मोदी ने कहा कि इस जगह से पुणे से महान नेताओं को संदेश मिला है। उन्होंने कहा, श्यह सावरकर की धरती है, तिलक की धरती है। फर्ग्युसन कालेज में लेक्चर देने की तिथि तय हुई तो मैंने एक प्रयोग किया। मैंने सोशल मीडिया पर नौजवानों से पूछा कि मुझे फर्ग्युसन कालेज में क्या कहना चाहिए। करीब 2,500 नौजवानों ने मुझे सलाह दी। मैं बस उन्हीं की सलाह को आपको सामने रख रहा हूं। मैं सिर्फ माध्यम हूं, ये विचार कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के 2,500 नौजवानों के हैं।

उन्होंने कहा कि जो लोग यह सोचते हैं कि नौजवान सिर्फ जीन्स पहनते हैं और बाल बढ़ाते हैं, वे भ्रम में हैं। नौजवान सोचते हैं। देश के बारे में सोचते हैं। कुछ करना चाहते हैं। उनमें उमंग है। सामर्थ्य है। यह सब देख कर लगता है कि देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता है। मोदी ने वहां मौजूद 5,000 छात्रों से कहा कि विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए भी यह युवा शक्ति काम आ सकती है, बस कोई काम करवाने वाला शख्स चाहिए। पूरे देश में निराशा का भाव है लेकिन मैं निराशा की बात नहीं करता। मुझे उम्मीदें दिखती हैं। नौजवानों का उमंग देखकर मैं उत्साहित हूं। मैं व्यवस्था बदलने में विश्वास रखता हूं।

भारत में पहले गुरुकुल शिक्षा की व्यवस्था थी। मोदी ने कहा कि हमारी गुरुकुल की शिक्षा परंपरा और अमेरिका की आधुनिक शिक्षा पद्धति की तुलना की जाए तो हमें पता चलेगा कि दोनों कुछ हद तक समान हैं। दोनों में लोगों को दिशा देने का काम होता है। हमें उस गुरुकुल व्यवस्था को आधुनिक पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से तुलना करने की जरूरत है। हमें गुरुकुल से विश्वकुल तक का सफर पूरा करना है। हमने उपनिषद से उपग्रह की यात्रा की है। दुनिया में पहला दीक्षांत समारोह भारत में हुआ था। तैतरीय उपनिषद में इसका विवरण मिलता है।

नरेंन्द्र मोदी ने कहा कि देश में निराशा का माहौल है, देश का युवा कुछ करना चाहता है, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। मोदी ने कहा,कि युवा न सिर्फ भारत को बल्कि पूरी दुनिया को निराशा के माहौल से बाहर निकालेंगे। भारत में गजब की ताकत है। यह देश 1,200 साल की गुलामी के बाद भी जिंदा है। सीना तानकर खड़ा है। विश्वविद्यालयी शिक्षा के 2,600 साल के इतिहास में भारत 1,800 साल तक दुनिया का सरताज रहा। सिर्फ गुलामी के 800 सालों में इसका नाश हुआ। पूरी दुनिया से लोग यहां पढ़ने आते थे।