मंगलवार, 24 अगस्त 2021

रविवार, 15 अगस्त 2021

1989 में अफगानिस्तान से सोवियत संघ ( रूस ) भी भागा था, आज अमेरिका भी भाग रहा है -


1989 में सोवियत संघ को भी अफगानिस्तान से जाना पड़ा था। उसके बाद अफगानिस्तान में तालिबान और अलकायदा जैसे इस्लामी आतकंवादियों का स्वर्ग बन गया। इन आतंकवादियो का साथ दिया था पाकिस्तान और अमेरिका ने, सोवियत संघ की सेना को अफगानिस्तान बाहर भागने के लिए ?  अमेरिका ने पाकिस्तान के कंधे पर सवार होकर तालिबान को हथियार और पैसे से मदद किया था। कहावत कहा जाता है कि जो दुसरे के लिए कुआ खोदता है, वह भी उस कुए में गिर सकता है ऐसा ही अमेरिका के साथ हुआ। जिन आंतकियो को अमेरिका ने मदद किया था। यही से संचालित अलकायदा ने 9/11/2001 को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में स्थित वर्ल्ड ट्रेड टावर को विमान हाइजेक कर उड़ा दिया था। इन्ही आतंकवादियो को खत्म करने के लिए अमेरिका ने अपनी सेना भेजा था। 20 वर्षों में अमेरिकी सेना के 3000 सैनिक मरे गए 14 हजार घायल हुए तीन ट्रियल डालर खर्च हुए। आज अमेरिका को अफगानिस्तान से हार कर जाना पड़ रहा है। आज ही के दिन 20 वर्ष बाद अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार की वापसी हो गई है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी तथा अन्य नेता और अधिकारीयों को अमेरिका की सेना ने तजाकिस्तान ले गए है।

1919 में अंग्रेजों से अफगानिस्तान आजाद होने के बाद खुले विचारों तथा महिलाओं की शिक्षा के साथ आधुनिक देश बनकर उभर रहा था। लेकिन अफ़ग़ानिस्तान का इतिहास संघर्ष भरा रहा है इसकी शुरूआत 1973 में तब हुई थी जब वहाँ के राजा ज़ाहिर शाह को गद्दी से हटा दिया गया था ज़ाहिर शाह अपनी आँख़ का इलाज कराने के लिए इटली गए हुए थे और उनके चचेरे भाई मोहम्मद दाऊद ने ही उनके पीछे ही बग़ावत करके राजमहल पर क़ब्जा कर लियामोहम्मद दाऊद ने अफ़ग़ानिस्तान को एक गणराज्य घोषित करते हुए, ख़ुद को राष्ट्रपति बना दिया मोहम्मद दाऊद ने अपना सत्ता केंद्र स्थापित करने के लिए वामपंथियों पर भरोसा किया और उभरते हुए पेट्रो डालर के दम से उभरते इस्लामी आंदोलन को कुचल दिया। इस्लामिक कट्टरतावाद को फैलाने के लिए बड़े इस्लामिक देश अन्य देशों के इस्लामिक गुटों को आर्थिक सहायता करते थे।   

लेकिन मोहम्मद दाऊद ने अपनी सत्ता के आख़िरी दिनों तक आते-आते अपने वामपंथी समर्थकों को सत्ता के पदों से हटाना शुरू कर दिया इसी बात से नाराज कम्यूनिस्ट ने विद्रोह कर दिया जिसे 1978 का देश के अप्रैल क्रांति के नाम से जाना जाता है अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दौर की शुरूआत हुई। अफ़ग़ानिस्तान सहित अन्य इस्लामिक कट्टरपन्थियो द्वारा इस्लामिक देशों में ऐसे ही सत्ता में परिवर्तन हुए। इस इस्लामिक सत्ता परिवर्तनों को रोकने के लिए सोवियत संघ ने अपनी सेना को अफगानिस्तान में कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार बचाने के लिए भेजा। सोवियत संघ को अपनी सेना भेजना सबसे बड़ी गलती थी।       

सोवियत संघ के कम्यूनिस्ट प्रभाव के विरोधी लड़ाकों (मुजाहिदीन) ने लाल सेना को देश से भागने के लिए भारी लड़ाई की थी इसमें पाकिस्तान के कंधे का उपयोग करते हुए, अमरीका ने आर्थिक व हथियार से भरपूर सहयोग मिला। यहाँ तक की इन लड़कों को पाकिस्तान में प्रशिक्षण और हथियार साथ ही पैसा भी दिया गया सोवियत सेना ने 10 वर्ष लड़ने के बाद आर्थिक रूप से कमजोर हो गई, टूटने के कगार पर पहुच गया दस साल के संघर्ष के बाद मई 1989 में सोवियत संघ ने आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेनाएँ हटा लीं। जैसे अमेरिका वियतनाम से भागना पड़ा। अत: 1989 में सोवियत संघ ने आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान से   सत्ता राष्ट्रपति नजीबुल्ला के हाथों में सौंप दिया वापस रूस चला गया नजीबुल्ला बबराक करमाल के बाद राष्ट्रपति बने थे। नजीबुल्ला बबराक करमाल के बाद राष्ट्रपति बने थेनजीबुल्ला सोवियत सेनाओं के हटने के बाद क़रीब तीन साल यानी 1992 तक सत्ता में रहे और संयुक्त राष्ट्र उस समय सत्ता के शांतिपूर्ण स्थानांतरण की कोशिश कर रहा था लेकिन पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला को तालिबान ने मार डाला। तब से लेकर अब तक अफगानिस्तान ..... 




शनिवार, 14 अगस्त 2021

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस , अखंड भारत और भारत की 75 वां स्वतंत्रता दिवस का अमृतमहोत्सव


भारत अपना 75 वां स्वतंत्रता दिवस पर अमृतमहोत्सव मना रहा है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा घोषणा किया है कि भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त दंगो में मारे गए लाखों लोगों को याद किया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा कि इस दिन को कभी भुलाया नहीं जा सकता पीएम मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए जानकारी दी कि अब से 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (Partition Horrors Remembrance Day) के तौर पर मनाया जाएगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस घोषणा को लेकर 14 अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से भारत सरकार का राजपत्रगजट जारी किया गया। इस अधिसूचना में जहां भारत के लोग, आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए अपनी प्रिय मातृभूमि के उन बेटों एवं बेटियों को नमन करते हैं, जिनको भारत के विभाजन के दौरान अपने प्राण न्योछावर करने पड़े थे, और जहां भारत सरकार ने विभाजन के दौरान अपने प्राण गंवाने वाले लोगों की याद में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवसके रूप में घोषित करने का निर्णय लिया है। अतः भारत सरकार, भारत की वर्तमान और भावी पीढ़ियों को विभाजन के दौरान लोगों द्वारा सही गई यातना एवं वेदना का स्मरण दिलाने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवसके रूप में घोषित करती है  

द्वितीय विश्वयुद्ध के हार के बाद ब्रिटिश, सैनिक व आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका थाअन्य देश को चलाने के लिए आर्थिक तंगी के कारण उपनिवेश देशों आजाद करने लगे थे। इसी क्रम में भारत को भी आजाद करने के लिए उन्होंने ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत 18 जुलाई 1947 को प्रस्ताव पारित किया उस समय भारतवर्ष की जनसंख्या के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम द्विराष्ट्र सिध्दांत के आधार पर  विभाजन किया जाना तय हुआ था अतः भारत देश हिन्दूओ के लिए तथा नया देश पाकिस्तान में मुस्लिमों के लिए दो देश में विभाजन किया गयापहला भारत बना दूसरा पाकिस्तान नया बना। पाकिस्तान के गठन के समय भारत के पश्चिमी क्षेत्र में सिंधीपठानबलोचपंजाब और मुजाहिरों की बड़ी संख्या थी, इसे पश्चिम पाकिस्तान कहा जाता था। जबकि भारत के पूर्व हिस्से में बंगाली बोलने वालों का बहुमत था, इसे पूर्व पाकिस्तान कहा जाता था। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश अलग देश बना  भारत में 556 रियासतों को विलय कर लोकतांत्रिक संप्रभुत राष्ट्र बना है   

भारत विभाजन के एक वर्ष बाद जिन्ना की टीवी बीमारी से मौत हो गई अंग्रेजों ने 20 वर्ष पहले ही भारत का विभाजन की तैयारी शुरू कर दिया था इसे रोका जा सकता था,  लेकिन उस समय के नेताओं ने भारत की सत्ता प्राप्त करने के लिए भारत के विभाजन को स्वीकार किया  इसमें महात्मा गाँधी पंडित नेहरू सरदार पटेल सहित कांग्रेस के सरे नेता जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के विभाजन को स्वीकार किया ।  प्रधानमंत्री मोदी ने स्वत्रंतता  के 75 वर्ष में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मानने की बात कह कर एक बड़ा अभियान छेड़ दिया है कंही न कही से अखंड भारत का रूप में एक सन्देश भी हो सकता है तथा कांग्रेस पार्टी ने भारत के विभाजन को स्वीकार किया यह बात आज के युवा पीढ़ी तक पहुचना भी था 



पाकिस्तान नासूर को खत्म कर दिया गया होता तो ..

बांग्लादेश के उदय के 50 साल पूरे होने पर आयोजित होने वाले समारोहों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 'मुजीब जैकेट' के साथ शामिल होगें


गुरुवार, 12 अगस्त 2021

आर्य ही भारत के मूल निवासी हैं


2011 में हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में हुई, हड़प्पाकालीन सभ्यता की खोदाई में मिले। 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थेबाहर से नहीं आए थे। इसलिए इतिहास को नये सिरे से लिखने की आवश्यकता है। मिले वैज्ञानिक सबूतों में आर्य बाहर से आये यहाँ की सभ्यता को नष्ट कर दिया और नए सभ्यता की शुरु किया। इसका कोई भी सबूत वैज्ञानिक सबूतों नहीं मिला है। भारत के लोगों के जीन में पिछले हजारों सालों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।  डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और इस प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ वसंत शिंदे और बीरबल साहनी पुरानीविज्ञानी संस्थानलखनऊ के डॉ. नीरज राय (डीएनए वैज्ञानिक) भी शामिल थे। 


डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और इस प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ वसंत शिंदे ने राखीगढ़ी में किये शोध के बाद बताया कि ‘‘हमारा अध्ययन आर्कियोलॉजिकल डाटा और जेनेटिक पर आधारित है। आर्कियोलॉजिकल शोध से पता चला कि शुरुआत ईसा पूर्व 7 हजार के आसपास हुई। आर्कियोलॉजिकल डाटा को बनाने में जो अवशेष मिले हैं, जैसाकि औजार, गहने, अलग-अलग क्राफ्ट मिलते हैं। उनका अध्ययन किया गया है। इसमें क्राफ्ट में एक प्रगति मिलती है। हड़प्पा सभ्यता के समय इन लोगों ने विकास किया। हमारा दूसरा अध्ययन जेनेटिक डाटा को लेकर है। ईसा पूर्व 2500 के आसपास के कंकाल हैं। राखीगढ़ी जो हड़प्पा सभ्यता के एक प्रमुख स्थानों में से एक रहा है, वहां से 2015-16 में हमें खुदाई में 40 कंकाल मिले है। इनमें से जलवायु के चलते अधिकतर कुछ काम के नहीं निकले लेकिए एक कंकाल काम का था। यह किसी महिला का था। कंकाल के जीन का हमने परीक्षण किया। जब इस जीन की तुलना दूसरे समकालीन लोगों के जीन से की गई तो दोनों एकदम अलग निकले। शोध में किसी भी मध्य एशिया के पूर्वजों के डीएनए का मिलान नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि राखीगढ़ी के रहने वाले लोगों का मध्य एशिया के लोगों से कोई संबंध नहीं है जबकि अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर अंडमान तक के लोगों के जीन से मिलान करने पर पता चला कि यह एक ही वंश के हैं। इससे साबित होता है कि आर्य भारत के ही थे, और हम आर्यों के ही वंशज हैं।’’

डीएनए साइंटिस्ट डॉ. नीरज राय ने कहा कि हमने हड़प्पा के एक प्राचीन जीनसमूह का मिलान सेंट्रल एशिया, मिडिल ईस्ट, ईस्टर्न यूरोप, वेस्टर्न यूरोप आदि के लोगों से कराया लेकिन मिलान नहीं हुआ। वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 2500 लोगों के ब्लड सैंपल लेकर उनका डीएनए और राखीगढ़ी में मिले मानव कंकाल के डीएनए का मिलान किया तो पाया कि आज भी उनका और हमारा डीएनए मेल खाता है। डॉ राय के मुताबिक, इससे ये साबित होता है कि हड़प्पावासी कहीं बाहर से नहीं आए थे बल्कि हमारे ही देश के मूलनिवासी थे। ‘‘उन्होंने ही खेती की खोज की। इन्हीं के समय वेद भी लिखे गए। अब यदि कोई आर्य शब्द जैसा टर्म इस्तेमाल करता है तो हम कह सकते हैं कि यही आर्य थे। डॉ राय के मुताबिक, हम ऐसा मानते हैं कि डीएनए की डायवर्सिटी जहां ज्यादा होती है, वहां से लोग कम डायवर्सिटी की ओर जाते हैं। शोध में राखीगढ़ी में रहने वालों लोगों के डीएनए में डायवर्सिटी ज्यादा मिली। इससे ये पता चलता है कि यहां के लोग विदेशों में गए न कि वहां के लोग यहां आकर बसे। वे कहते हैं कि, 1500 बीसी से पहले तक मिक्सिंग नहीं हुई है।

जब कोई भी व्यक्ति बाहर से भारत में आता है तो अपने साथ अपनी सभ्यता भी लेकर आता है साईटिफिक पद्धति से डीएनए निकला गया है इसमें हावर्ड युनिवर्सिटी के डीएनए वैज्ञानिक और जर्मन मैक्स प्लान युनिवर्सिटी तथा सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मोलेक्यूलर बायोलॉजी ( कोशिका और आणविक जीवविज्ञान केंद्र The Centre for Cellular and Molecular Biology or CCMB ) के साथ मिलकर साईंटिफिक जरनल में शोधकर्ताओं प्रकाशित हो चूका है। इस शोध में 16 देशों के लगभग 40 वैज्ञानिकों ने कार्य किये है। अब इसपर कोई भी सवाल नहीं है इसलिए आर्यन इंवेशन Aryan invasion theory की थ्योरी को खत्म हो जाना चाहिए। भारत में आर्यो ने हमला कर सिन्धु घाटी सभ्यता खत्म किये और यहाँ के मूल निवासियों को दक्षिण में भगा दिया      

नए शोध पर मिले आंकड़े के अनुसार भारत सरकार के यूजीसी ने इतिहास के छात्र के पाठ्यक्रम में शामिल किया है उसमे इतिहास (ऑनर्स) के पहले पेपर को आइडिया ऑफ भारत नाम किया गया है। इसमें भारतवर्ष की अवधारणा के साथ-साथ वेद, वेदांग, उपनिषद, महाकाव्य, जैन और बौद्ध साहित्य, स्मृति और पुराण पढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इतना ही नहीं एक चैप्टर में भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति, अंतरीक्ष, विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, आयुर्वेद और योग तक के भारतीय विचारों को रखा गया है। अब तीसरे पेपर में सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ (  The Indus – Saraswati Civilization) के नाम से एक बिषय जोड़ा गया है। इसमें सिंधु, सरस्वती सभ्यता और वैदिक सभ्यता के संबंधों पर बहस का वर्णन किया गया है। अंग्रेजो ने भारत की गुरुकुल शिक्षा को बदल कर स्कुल व्यवस्था लागु किया और भारत के इतिहास को बदल दिया। इसमें मैक्समूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस, मैकॉले इन चारों लोगों के कारण भारत के इतिहास को बदलकर विकृतिकरण किया। अंग्रेंजों द्वारा लिखित इतिहास में चार बातें प्रचारित की जाती है। पहली यह की भारतीय इतिहास की शुरुआत सिंधु घाटी की सभ्यता से होती है। दूसरी यह की सिंधु घाटी के लोग द्रविड़ थे। तीसरी यह कि आर्यो ने बाहर से आकर सिंधु सभ्यता को नष्ट करके अपना राज्य स्थापित किया था। चैथी यह कि आर्यों और दस्तुओं के निरंतर झगड़े चलते रहते थे। आर्य बाहर से आए थे लेकिन कहां से आए हैं उसका कोई सटीक जवाब किसी इतिहासकार के पास नहीं है। कोई सेंट्रल एशिया कहता है, तो कोई साइबेरिया, तो कोई मंगोलिया मतलब यह कि किसी के पास आर्यों का सुबूत नहीं है। लेकिन इस थ्योरी को सबसे बड़ी चुनौती 1921 में मिली। लेकिन अंग्रेजों की मानसिकता के इतिहाकारों ने धीरे धीरे यह प्रचारित करना शुरु किया कि सिंधु लोग द्रविड़ थे और वैदिक लोग आर्य थे। सिंधु सभ्यता आर्यों के आगमन के पहले की है और आर्यों ने आकर इस नष्ट कर दिया। 

अमेरिका मूल के डॉ डेविड फ्रॉले उर्फ वामदेव शास्त्री  ने कई बार भारत में व्याखान में कहा है कि पूरी दुनिया में आर्य यहाँ से बाहर गए है, आये नहीं है। लेकिन आज भी भारत में यही पढाया जाता है कि आर्य बाहर से आये थे। विदेशियों ने अगर आपकी पाठ्य पुस्तकों में इतिहास  के नाम से कुछ भी लिख दिया हो, अपने फायदे के वह अंतिम कैसे हो सकता है। भारतीयों को नहीं भूलना चाहिए की उनका इतिहास उसके औपनिवेशिक काल में लिखा गया है। जितने भी देश औपनिवेशिक काल के अंर्तगत थे, उन्होंने अपना इतिहास बदल दिया जैसे की चीन ने भी किया।  सभी भारतीयों से अपने अतीत को अपने नजरों से देखे और उसपर गर्व करे।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही अयोध्या मामले की 40 दिन की सुनवाई के दौरान भारत में आर्यों का अस्तित्व पर फिर से चर्चा में आया। हिंदू पक्षकार के वकील के पाराशरण ने कहा कि आर्य यहां के मूल निवासी थे, क्योंकि रामायण में भी सीता माता अपने पति श्रीराम को आर्य कहकर संबोधित करती हैं। ऐसे में आर्य कैसे बाहरी आक्रमणकारी हो सकते हैं?

इस शोधकार्य  को 16 देश के 40 वैज्ञानिकों की टीम ने कार्य किये है। इनमें डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और इस प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ वसंत शिंदे और बीरबल साहनी पुराविज्ञानी संस्थान, लखनऊ के डॉ. नीरज राय (डीएनए वैज्ञानिक) भी शामिल थे। 

बुधवार, 4 अगस्त 2021

बिश्रामपुर की शान रहा, शक्ति ड्रगलाइन जंग खा रहा है | Marion walking dragline removing overburden at a coal surface mining operation, SECL Bishrampur Coalfiled Area

 


पिलखा पहाड़ की तलहटी पर साल और महुआ के वृक्ष की हरियाली से सुशोभित, रेणुका नदी की जलधारा के किनारे तथा कटनी-गुमला राष्ट्रीय राजमार्ग क्र.78 पर काला हीरा के विशाल भण्डार को अपने गर्भ में सजोये हुए विश्रामपुर क्षेत्र जो ऍनसीडीसी द्वारा बसाया गया एक नगर है ब्रिटिश काल में हुए सवेक्षण में बिश्रामपुर झिलमिलीकोल ब्लाक के नाम से जाना जाता है। इस बिश्रामपुर कोल ब्लाक से कोयले के परिवहन के लिए अनुपपुर से बिश्रामपुर तक रेललाईन 1962 में लाया गया है। इसके बाद ही विशालका्य ड्रगलाईन को लाया गया था। ब्रिटिश काल में बिश्रामपुर सी पी एड बरार स्टेट का हिस्सा था, 1954 में मध्यप्रदेश राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश का हिस्सा बना तथा अब वर्तमान में 2000 छत्तीसगढ़ राज्य का हिस्सा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी से 350 किमी तथा संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर से 28 किमी. पश्चिम तथा जिला मुख्यालय सूरजपुर से 12 किमी. पूर्व में स्थित है।

भारत स्वतंत्र होने के बाद अपने चहुमुखी विकास के लिए, नए नए कल कारखाने साथ उद्योगिग विकास का कार्य शुरू होने लगा। इस विकास करने के लिए बिजली की सबसे ज्यादा जरुरत थी उस समय कोयला इसका मुख्य आधार थावर्ष 1956 में भारत सरकार ने उपक्रम राष्ट्रीय कोयला विकास निगम (एन.सी.डी.सी.) की स्थापना किया गया जिसके तहत योजनाबध्द भारतीय कोयला उद्योग के सुनियोजित विकास कर उत्पादन को बढाया जाये जो की सरकार का पहला बड़ा कदम है। इसी के आधार पर कोल बैरिंग एक्ट 1957 कोयला खदान खोलने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है

1958 में बिश्रामपुर कोल ब्लाक पर काम शुरू हुआकोल बैरिंगएक्ट 1957 के अंतर्गत उरडबाहर गाव को अधिग्रहण कर सतापता, शिवनदनपुर, केशवनगर, गोरखनाथपुर, कुन्जनगर, जयनगर, कुम्दा आदि गांवो से भूमि अधिग्रहण किया गया लगभग 8 हजार हेक्टेयर में ओपनकास्ट, जयनगर व न्यू जयनगर, कुम्दा भूमिगत, को शुरू किया गया। 1960 तक सभी खदानों से उत्पादन शुरू हो गया था। लेकिन रेलवेलाइन नहीं होने के कारण कोयले का परिवहन शुरू नहीं हो पाया था। 1962 में बोरीडाड से बिश्रामपुर तक नई लाइन बिछाया गया। 1960 में बिश्रामपुर नगर प्रशासन के लिए आवास का निर्माण भी शुरू हुआ। यह आज भी स्मार्ट सिटी बिश्रामपुर की कल्पना किया जा सकता है आज से 60 वर्ष पूर्व कोल कम्पनी स्मार्ट सिटी बना सकती है।

Bishrampur shakti Marion 7800 dragline @ramashanker62
   

भारत के विकास हेतु कोयले की मांग के अनुसार पूर्ति करने हेतु बहुत ही विशालका्य ड्रगलाइन मशीन को भारत सरकार ने बिश्रामपुर कोल ब्लाक को दिया गया। आज एसईसीएल बिश्रामपुर क्षेत्र की शान कहे जाने वाले विशालकाय शिवा शक्ति ड्रगलाइन मशीन है

छ: दशक पूर्व अमेरिका से एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े ड्रगलाइन की आयात किए गए। यह ड्रगलाइन रेलवे के द्वारा बिजुरी में आकर रखा हुआ था। उस समय अच्छी रोड नहीं था। 1600 टन मशीन को लेकर आने के लिए गाड़ी ट्रक भी नहीं था और सड़क भी नहीं था। इसलिए बिश्रामपुर तक नई रेल्वे की पटरी बिछाने तक रुका हुआ था। 1962-63 में बिश्रामपुर में आया इसे एक्स्वेशन में असेम्बल किया गया। 1964 में इसे चालू कर बिश्रामपुर में कोल कंपनी को कमीशन किया गया। मेरियन 7800 को भारतीय नाम शिव शक्ति दिया गया। अमेरिका से मेरियन कंपनी की मेरियन पावर शावेल कंपनी से माडल मेरियन 7800 शिवा व शक्ति नामक दो ड्रगलाइन मशीनों को करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये में खरीद कर आयात किया गया था।

यह इस विशालकाय मशीन का वजन 1860 टन एसईसीएल बिश्रामपुर क्षेत्र में ओपन कास्ट खदान से कोयला उत्पादन करने ओबी हटाने के लिए उपयोग में लाया गयायह  दोनों विशालकाय मशीनें अपने जमाने की एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी मशीनें थी। इस कोल क्षेत्र की बिश्रामपुर ओपन कास्ट परियोजना में 30 नवंबर 1964 को शक्ति ड्रगलाइन एवं 10 अगस्त 1967 को शिवा ड्रगलाइन से ओबी उत्पादन का कार्य प्रारंभ किया गया था। ओपन कास्ट (खुली खदान) के कोयला उत्पादन में ड्रगलाइन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कोयले की सिम के ऊपर से मिट्टी हटाने के लिए में मशीन के बोकेट से एक बार में 39 क्यूबिक यार्ड मिट्टी हटाई जाती है। यह मशीन अकेले प्रतिदिन सैकड़ों मजदूरों से ज्यादा ओबी हटाने का करती रही है। इसके एक दिन खड़े रहने से कंपनी को लाखों रुपए की क्षति होती थी। बताया गया कि 10 अगस्त 1967 को चालू शिवा ड्रगलाइन की कार्य क्षमता समय सीमा 30 साल अथवा 1.40 लाख घंटा निर्धारित थी, जबकि प्रबंधन ने इस मशीन से 50 वर्षों में 2.07 लाख घंटे काम लिया है।

इन दोनों मशीनों के कारण ही बिश्रामपुर क्षेत्र में अपने जमाने में कोयला उत्पादन के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने का गौरव हासिल किया था। दोनों ही मशीनें अपने कार्य क्षमता की समय सीमा पूरी कर चुकी है। इनमें से शिवा ड्रग लाइन को सर्वे ऑफ करने के बाद नीलाम कर दिया गया है। वहीं शक्ति ड्रगलाइन को किसी तरह खींचतान कर चलाया जा रहा है। वह भी सर्वे ऑफ होने की कगार पर खड़ी है।

शिवा ड्रगलाइन मशीन को दिल्ली स्थित भारत सरकार की अधिकृत एजेंसी द्वारा नीलामी प्रक्रिया के तहत कानपुर की जय मां ज्वालामुखी आयरन स्क्रैप फर्म को 2.71 करोड़ में नीलाम कर दिया गया है। नीलामी के साथ ही बिश्रामपुर क्षेत्र का गौरव कहे जाने वाली शिवा ड्रगलाइन का अस्तित्व समाप्त हो गया शिवा ड्रगलाइन पर एक नजर अमेरिका से आयातित शिवा ड्रगलाइन का वजन 1860 टन था।

सात साल से खड़ी है ड्रगलाइन सूत्रों की मानें तो पांच अप्रैल 2011 को कार्य के दौरान शिवा ड्रगलाइन का मेन शॉफ्ट टूट गया था। शॉफ्ट टूटते ही मशीन ने काम करना बंद कर दिया था, जिससे कंपनी को अपूरणीय क्षति का सामना करना पड़ा था। प्रबंधन द्वारा अमेरिका स्थित कंपनी से मशीन का शॉफ्ट मंगाने संबंधी प्रस्ताव एस ई सी एल कंपनी मुख्यालय बिलासपुर को भेजा गया था। पांच दशक पूर्व करीब पौने दो करोड़ रुपये में मंगाई गई इस मशीन के शॉफ्ट की कीमत अनुमानित दो करोड़ रुपये बताई गई थी। इसी बीच 12 अप्रैल 2017 को प्रबंधन द्वारा इस ड्रगलाइन मशीन को सर्वे ऑफ घोषित कर दिया गया।

---------------------------------------------------------------------------------------------------------------

सुझाव -