शनिवार, 13 जुलाई 2013

बोफोर्स दलाल क्वात्रोच्चि

        16 अप्रैल इटली के रेडियों से एक समाचार का प्रसारण किया गया। पूरे भारत में हडकम मच गया । यह समाचार था कि बोफोर्स के खरीदी में दलाली दी गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस समाचार को रोकने के लिए पूरी कोषिष श्किया । अनेक समाचार पत्र को मैनेज कर लिया गया। लेकिन इंडियनएक्प्रेस ने इस समाचार को प्रमुखता से छापा, पूरे देष इस समाचार से स्तब्ध होगा। राजीव गाधी की छवि एक सामान्य जनक थी । लोगों को विष्वास नही हुआ कि राजीव गांधी ऐसा भी कर सकते है। बोफोर्स घोटला के नाम से जाना गया और कांग्रेस का ग्राफ गिरता ही गया ।

       1986 में स्विस आर्म्स निर्माता कंपनी बोफोर्स ने हाविट्जर तोपों की सप्लाई के लिए भारत के साथ 1600 करोड़ रुपये का सौदा किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी पत्नी सोनिया गांधी के करीबी दोस्त माने जाने वाले क्वात्रोच्चि पर इस सौदे में एजेंट की भूमिका निभाया था। सोनिया के मित्र क्वात्रोच्चि पर आरोप था कि इस सौदे के बदले उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद को आश्वासन दिया था कि बोफोर्स तोप खरीद में कोई घोटाला नहीं हुआ है। देष ने इस घोटाले में राजीच गांधी को दोशी मानते हुए 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया ।

       इतालवी कारोबारी ओतावियो क्वात्रोच्चि बोफोर्स घोटाले का अहम किरदार माना जाता रहा है। क्वात्रोच्चि पर बोफोर्स तोप सौदे में दलाली लेने का आरोप था। क्वात्रोच्चि को भारतीय राजनीति के सबसे ताकतवर गांधी परिवार का निकट माना जाता रहा है। जब भी सत्ता में काग्रेस आई तो क्वात्रोच्चि को अनेक बार बचाया गया। गिरफतारी से बचने के लिए क्वात्रोच्चि 1993 में भारत से फरार कराया गया था। इस मामले में तोता पिजडा में बंद रहा । अनेक बार गिरफतार क्वात्रोच्चि को भारत नही लाया जा सका क्यों कि जिस देषों में  क्वात्रोच्चि गिरफतार किया जाता वहां पर प्रत्यपण संधि न होना । उसकी मौत के साथ ही इस घोटाले से जुड़े कई राज दफन हो गए। 

शुक्रवार, 28 जून 2013

देश में आपदा प्रबंधन पर करे पुन: विचार


      उत्तराखंड में केदारनाथ धाम से शुरू हुआ आपदा ने आपदा प्रबंधन पर विचार करने के विवश किया है | आपदा प्रबधन किसी भी स्थान पर किसी प्रकार की आपदा से आने पर लोगों द्वारा सहयोग किया जाता रहा है । जैसे अधिक वर्ष के समय पर अनेक गांव में पानी भर जाते है ऐसे स्थानों के लोगों को सुरक्षित ले जाना एवं भोजन पानी की व्यवस्था करना यदि काम करना ही आपदा प्रबंधन होता है। यदि यहां बडे स्तर हो जैसे भूकंप,तूफान या बाढ आने पर लोगों को सहायता करना, फंसे लोागो तक भोजन पानी तथा सुरक्षित स्थान पर ले जाना आदि अनेक कार्य है। प्रकृति द्वारा जो आपदा आती है ,प्रकृति आपदा की सरल परिभाषा है कि यह प्रकृति से छेड़छाड़ और कुप्रबंध का परिणाम है। प्रकृति का हमने वर्षों से जैसा शोषण किया है उसका यह परिणाम है। मूक प्रकृति ने इस दुर्व्यवहार का बदला लेना शुरू किया है और प्राकृतिक आपदा अब बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने है।

     आपदाओं की चिंता के तहत सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एक आपदा प्रबंधन इकाई का गठन किया। इसका मूल उद्देश्य आपदाओं के प्रति सचेत व नियंत्रण रखने की रणनीति पर अमल करना है। देश के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर आपदा नीति भी है और साथ में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी भी। इनकी सहायता के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान भी गठित किया गया। प्रधानमंत्री स्वयं अथॉरिटी के अध्यक्ष हैं। लेकिन अनेक वर्षो से बैठक ही नही हुआ है ।

     उत्तराखंड में आये आपदा के बाद नरेन्द्र मोदी ने देहरादून जाकर वहां से गुजरात के लोगों को अपने साधन से गुजरात भेज दिया तो मीडिया में खबर चला कि मोदी 15000 हजार लोगों को लेकर उड गये । यदि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र स्तर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन से राज्यों को जोडा होता तो देश की पूरी आपदा प्रबंधन की टीम उत्तराखंड में हजारों लोगों को और बचाया जा सकता था । चारधाम की यात्रा में देश के सभी कोने से लोग यात्रा करते है। सभी राज्य के लोगों को बचाया जा सकता था।

       आपदा प्रबंधन पर राज्यों में कोई आपदा नीति नहीं है और वहां आपदा आने पर ही चर्चा या कार्रवाई होती है। औपचारिक तौर पर आपदा कार्यालय हर राज्य में आवश्यक है | लेकिन केंद्र और राज्यों में कोई समन्वय नहीं दिखता है। हम एक दृष्टि आपदाओं और उनके प्रबंधन पर नजर डालें, तो निराशा हाथ लगेगी। हमारे देश में आपदा के बाद रेड अलर्ट शुरू होता है। आपदा आने पर ही हलचल होगी और सच तो यह है कि विभाग अपनी उपस्थिति दर्ज करते है बस ।

      किसी भी आपदा प्रबंधन को तीन चरणों में देखा जाता है। आपदा में तत्काल, अल्प अवधि व दीर्घकालीन प्रबंधन की बात होती है। दीर्घकालीन प्रबंधन में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। परंतु तत्काल व अल्प अवधि प्रबंधन स्थानीय संसाधनों पर ही निर्भर रहता है। स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के गुर लोगों को प्रषिक्षण देने होगे । यह काम स्कूलों से शुरू किया जाय तो आने वाले समय के लिए और अच्छा रहेगा। नरेन्द्र मोदी ने जो काम किया वह एक मांडल के रूप में दिखाया है। सभी लोग निस्वार्थ भाव से आपदा प्रबंधन का कार्य करे तो देश को बडे हानि से बचाया जा सकता है।

गुरुवार, 27 जून 2013

चार धाम की यात्रा


       उत्तराखड में अत्याधिक वर्षा तथा केदारनाथ के उपर महात्मा गाँधी बांध के टूट जाने से हुई भारी तबाही एवं जनहानि हआ है । यह अत्याधिक हदयविदारक एवं प्रकृति घोर उपेक्षा से तबाही हुआ है। यह कहा जाय कि प्रकृति ने लोगों का एक प्रकार से चेतावनी दिया है कि पहाड एव वनों से छेडछेडा अधिक हो रहा है। यही हाल रहा तो दुनिया तबाही की ओर जा रही है। केदारनाथ से रुद्ररूप में निकली गंगा( मंदाकिनी ) जी ने जो तबाही मचाई कि उत्तराखंड के मुख्यमत्री को कहना पडा कि केदारनाथ कि या़त्रा दुबारा शुरू करने में दो साल लगेगे।

        प्राचीनकाल से पूरे भारत वर्ष को जोडने के लिए आद्य शकराचार्य ने चारोधाम की या़त्रा प्रांरभ किये था । यात्रा का मुख्य उददेष यही था कि पूरे भारत वर्ष को सांस्कृतिक रूप से, ज्ञान ,उपदेषों ,प्रवचनों के द्वारा एवं धार्मिक, अध्यामिक शक्ति से एक राष्ट्र  की भावना का जागरण हो। हजारों वर्षो से युवा सन्यासियों , अध्यात्मिकता ओर जाने वाले संनसारिक लोग भी यात्रा के लिए निकल पडते थे। यात्रा पर जाने से पूर्व अपने सगे सबधियों से मिल कर जाते थे कि वापस आने कि उम्मीद नही के बराबर होता था। यदि यात्रा के समय मृत्यु हो जाय तो जीवन धन्य माना जाता कि भगवान की कृपा से मोक्ष प्राप्त हुआ है।

        उत्तराखंड में आऐ इस आपदा ने लोगों के मनोबल को कमजोर किया जाने की कोशिश मीडिया और विधर्मीयों किया जा रहा है। केदारनाथ मंदिर के पुजारी जी ने कहा कि आज आस्था एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए चारधाम की यात्रा का भाव नही है बल्कि अधिकाश पिकनीक मौज मस्ती के लिए धार्मिक यात्रा आते है। टीवी पर मीडिया द्वारा जो दिखाया जा रहा जो लोग बच गये रोते बिलखते दिखते है | यह कहते है कि अब दुबारा यात्रा पर नही जायेगे। अपने भारत के सांस्कृतिक महत्व की अज्ञानता के कारण चारोधाम यात्रा के बारे भ्रम फैला रहे है | कहने का मतलब यही है हमारी आस्था और सास्कृतिक भावना मजबूत होना चाहिए |

बुधवार, 12 जून 2013

नवीन जिंदल भी कोयले से काले.............

                                                                                  
                कोयले की कालीख से अनेक नेताओ के मुह हो रहे है। जब से सुप्रीप कोर्ट ने सीबीआई को कोर्ट में रिपोर्ट करने कहा है] तब से कांग्रेस की सरकार भी हेरा फेरी नही कर सकती है। अभी नवीन जिदल के उपर CBI ने एफ आई आर दर्ज किया है। नवीन जिदल ने मंत्री को घूस दिया था। नवीन के पिता श्री ओम प्रकाश जी ने छत्तीसगढ के रायगढ के पास लोहे की फैकटरी ला गई । कुछ वषो में अच्छा लाभ कमाया फिर पिछे मुडकर नही देखा । 1993 मे उदारीकरण के कारण कांग्रेसी सरकार उन्हे कैपिटिव कोल माईस तमनार के पास दिया गया।



            तमनार के अनेक गाव में कोयला निकालनेके लिए  जमीन चाहिए था |  गरीब आदिवासीयों  किसानों के जमीन पर कोयला डाल कर उनकी जमीन को सस्ते में खरीद लेना, इस प्रकोर का काम अनेक बार किया है। सस्ते जमीन पर से कोयला निकालना और गरीवों के जमीन पर कब्जा करना जेएसेपीएल नाम का कंपनी का सामाज्य खडा किया ।
 

            यह सब वहा के अनेक सामाजिक सगठनों ने अनेक बार जिदल के खिलाफ आंदोलन किया है ।  कोर्ट ने कुछ अडगा किया जिसके कारण जिदल ने लीपा पोती किया है। २०१२ में कोयला घोटला उजागर होने के बाद जी न्युज टीवी ने एक रिपोर्ट टीवी दिखाया था । जिस पर जिदल ने स्टिग आपरेषन कर सरकार के सहयोग से जी न्युज को फॅसाया था। लेकिन आज सीबीआई ने मामला दर्ज किया और जिदल के ठीकाने पर छापा मारा है।


             मैने अपने परिचित मित्रों से पता किया तो उन्होने बताया कि छापा कि खबर मिलते रायगढ आफिस के कागजों को छिपा दिया गया है ।  जिदल के उपर हो रही कार्य वाही से सामाजिक संगठन एवं जनता में न्याय की आस फिर से महसुस होने लगी है।

बुधवार, 20 मार्च 2013

निर्मल यमुना जी



       उत्तरप्रदेश तथा हरियाण से यमुना बचाओं दल ने मथुरा से दिल्ली की घेराबंदी शुरू की तो ऐसा ही कुछ हुआ कि -सोई सरकार जागकर दिखावटी कारवाही करने लगी । यमुना की स्वच्छता ज्यादा पानी छोड़ने की मांग लिए आस्था की हिलोर के साथ जन ज्वार उमड़ पड़ा। डरपोक सरकार ने दिखाने के लिए तो सड़ती-मरती यमुना में ओखला बैराज से अचानक पानी छोड़ा शुरू किया जाने लगा।

       यमुना जी स्वच्छ निर्मल प्रवाह सदा बना ठीक रहे इसके लिए कठोर नीति हो, जो यह तय करना जरूरी है। वजीराबाद बैराज के बाद यमुना का बहाव कम से कम दस क्यूबिक मीटर प्रति सैकंड होना चाहिए जबकि रह जाता है सिर्फ 2-3 क्यूबिक मीटर प्रति सैकंड। सरकार को बताना होगा कि 1993 से नदी में जहर घोलने और सफाई के नाम पर 5000 करोड़ों रुपये पीने वालों को अब तक क्यों खुला छोड़ा गया?

               देश की राजधानी दिल्ली है देष के लोग यमुना का हिसाब दिल्ली से मांग रहे है। यह जवाबदेही इसलिए भी बनती है क्योंकि क्षेत्र के हिसाब से देश का सबसे बड़ा शहर दिल्ली ने यमुना की जान लेने में भी सबसे आगे है। राजधानी की 70 प्रतिशत प्यास यमुना बुझाती है। बदले में यमुना को इसके कुल प्रदूषण का 80 प्रतिशत जहर दिल्ली से मिलता है।

               यह है पढ़े-लिखे लोगों और चैतरफा विकास का दम भरने वाले नीति-निर्माताओं का  व्यवहार एक पवित्र नदी। शहरी समाज तो आस्था की इस अविरल धारा से कटा हुआ है, दारू बनाने वाली कंपनी को पानीं लुटाने वाली यमुना में जल नही छोडते है बल्कि अधिक मात्रा प्रदुषण स्तर से तेरह गुना ज्यादा औद्योगिक कचरा और रासायनिक जहर इस नदी में छोडा जा रहा है।

               पिछले वर्ष में अहमदाबाद गया था और साबरमति पर निर्माण समाप्ति की ओर था । जिस नदी पर के किनारे गांधी जी का आश्रम है कुछ वर्ष पुर्व गटर का पानी बहता था और गर्मी में धुल उडने वाली नदी का कायाकल्प बदल गया। 2004 में 1180 करोड.की सबारमती योजना बनाकर 9 वर्षों में दुनिया की सुन्दर नदी बना दिया गया। साबरमती में जल लाने के लिंए नर्मदा जी स जल को नहरो द्वारा पहुचाया गया। साबरमती नदी आज पुन जीवित हो उठी है । इसका श्रेय अहमदावाद लोगों को जाता है कि उन्होने इस काम के लिए पुरा गुजरात सहयोग किया विरोध कभी नही किया । गटर के पानी को फिल्टर प्लाट तक मोडा गया अब स्वच्छ कर छोडा जाता है । दोनों किनारे पर सुन्दर दिखने हेतु वृक्ष रोपड किया जा रहा है । आज साबरमती की तुलना टेम्प नदी से होती  है |

  

        क्या दिल्ली के लोगों ऐसा प्रयास यमुना जी स्वच्छ बहते रहे। अबतक 5000 करोड खर्च करने के बाद यमुना का पानी साफ नही हो क्यों कि -संयंत्र जरूरत के हिसाब से लगे ही नहीं। जो लगे भी हैं उनका हाल यह कि क्षमता का आधा इस्तेमाल भी हो नहीं पाता। शहर की अस्सी प्रतिशत गंदगी से अटे बड़े-बड़े बजबजाते नाले सीधे यमुना में जा मिलते है तो कैसे होगा हो निर्मल यमुना। साबरमती के लिए जो प्रयास किया गया है ऐसा ही प्रयास यमुना के लिए हो सकता है ।

 

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

सरगुजा में ईसाई मिशनरी से बढ़ता खतरा


        छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग जनजतीय बहुल क्षे़त्र होने के कारण यहां पर हजारों वर्षो से वनवासी रह रहे। वनवासियों को ईसाई मिशनरी द्वारा बहला फूसलाकर ईसाई बनाने का कार्य लगभग 100 वर्षों से चला रही हैं । लेकिन ईसाई मिशनरी अपने धर्मपरिवर्तन के काम में असफल होने पर उनके पादरियों और ननों द्वारा किसी भी प्रकार से विवाद खडा किया जाता रहा है। ईसाई मिशनरियों का मुख्य काम है धर्म परिवर्तन करना है, किसी भी प्रकार से ये लोगों को धोखे या प्रलोभन देकर धर्मातरण करते हैं। ईसाई मिशनरी सेवा के आड़ में चुपचाप अपना खेल खेलते है । जगह जगह पर स्कूल कालेज अस्पताल खोलते है़। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे को आसानी से अपना शिकार बनाते है। बच्चों के बालमन पर किसी प्रकार से ईसाई बनाने का प्रभाव डालते है। जब कोई बच्चा इनके चगुल में नही फॅसता है, तो उस पर अनेक प्रकार से अत्याचार करते है। अस्पताल में आने वाले रोगियों पर इसीप्रकार की धोखेबाजी भी करते है। यदि कोई रोगी ठीक नही होता उसे प्रार्थना और चंगाई, अंधविश्वास की नौंटकी करते है।
        सरगुजा संभाग में इस प्रकार की घटनाओं का इतिहास है। 1956 में बनी नियोगी कमीशन की रिर्पोट में धर्मातंरण के हजारों प्रकरण का उल्लेख है। तत्काल में सरगुजा के अम्बिकापुर के दरिमा चिरिगा कल्याणपुर में मिशनरी स्कूल आषादीप में पादरी द्वारा 4 बच्चियों के साथ अनैतिक कार्य किया । जब एक बच्ची अपने घर में जा कर अपनी माँ को बताई तथा बच्ची के पिता ने थाने में जाकर रिपोंर्ट लिखाया। पुलिस मिशनरी के दबाब में आकर रिपोंर्ट नही लिखी ।  गाव में इस घटना की खबर तेजी से फैला, बाद अनेक बच्चीयों ने अपने घरवालों को बताया। तो पूरा गाव थानों का घेराव करने पहुचा, जिसके बाद रिपोर्ट लिखा गया और अपराधी पादरी मिनसेंट टोप्पों को जनता की दबाव में गिरफ्तार किया गया । पूरे प्रदेष में हो रहे विरोध से घबराकर ईसाई मिशनरी के स्कूलों ने अम्बिकापुर के सेन्ट जेवियर स्कूल में एक बैठककर इस प्रकार घटना से अपना पल्ला झाड़कर एवं अशासकीय संस्था को बदनाम करने कोशिश करार दिया गया, जो कि एक प्रकार से अपराधियों का समर्थन ही है।
        इस घटना से पूर्व गुतूरमा सीतापुर में शासकीय छात्रावास की ईसाई अधिक्षिका के पति ने छात्रावास अध्ययनरत कई बालिका का अनेक बार शाररिकशोषण किया। यह घटना ध्यान में आने पर आरोपी पति एवं पत्नी को गिरफतार किया गया । इसी प्रकार की घटना बगीचा क्षेत्र में ईसाई शिक्षिका ने अपने शासकीय स्कूल की 4 छात्राओं की चोटी काट दिया, छात्राएं शर्म के कारण कई दिनों तक स्कूल नही गई, जन आक्रोष एवं शिकायत होने पर शिक्षिका को वहां से हटा दिया गया । लेकिन बच्चियों के मन पर जो घाव है वो कैसे भरेगा ।
       दूसरी घटना राजपुर विकासखण्ड के आरा गांव के बीच में चंगाईसभा का आयोजित किया गया । बाहर से आकर धर्मान्तरित हानेवालों लोगो को बुलाकर उनका धर्मान्तरण करना था, उसी गाव के दो आदिवासी युवको का चगाई के द्वारा उनका धमान्तरण करने का काम किया जा रहा था कि गाव के लोगो को शंक होने पर तुरंत पुलिस को बुलाकर चंगाई में भाग लेने 15 लोगो को गिरफतार किया गया । जिसमें से सभी उत्तरप्रदेष और झांरखण्ड थे।
        इन सभी बिन्दूओं पर गौर किया जाय तो मालूम पड़ता है कि अधिकांश मामले में ईसाई संस्था के लोग ही शामिल है, इसका मतलब यह है कि ईसाई मिशनरी के लोगों द्वारा कही न कही हिन्दू वनवासीयों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिऐ ही ऐसा कृत्य किया जा रहा है। सरगुजा में ईसाई मिशनरी द्वारा धोखे से धर्मातरण किया जा रहा है़। इसका उदाहरण अम्बिकापुर न्यायलय ने कुछ वर्षो पूर्व धर्मान्तरण करने के आरोप में एक पादरी एवं नन को सजा साथ में जुमाना दिया गया था।
        दुनिया के कई देषों में बच्चों के साथ मिशनरीओं के पादीरयों द्वारा अनेक प्रकार के दुकृत्य किये हैं। इस मामले को लेकर दुनिया के अनेक देषो में हो रहे विरोंध के कारण पोप को माफी मागनी पड़ी। सैकडों नही करोडे मामले जिसमें पादरियों ने चर्च में पढने वालों बच्चों के साथ अनैतिक कार्य किये। इनके अपराध पर वहां की सरकार एवं न्यायालय कई को कडी सजा भी दी गई है। लेकिन इसके बाद भी दुनिया भर में नही रूक रहा है । पादरी और ननों द्वारा जिस प्रकार से धर्मान्तरण एवं अत्याचार हो रहा है । समाज में इनके प्रति अविष्वास निमार्ण हो रहा है। यदि किसी प्रकार की घटना होने पर इसकी जिम्मेंदारी भी ईसाई समाज की है। धर्मान्तरण के खिलाफ अनेक घटना हो चुका है। उडिसा में गुजरात मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियों के संग्दिध गतिविधियों के स्थानीय नागरिकों का विरोध का सामना करना पडा है । इन सभी घटनों जिम्मेंदार ईसाई संस्था भी है।
       इन सारी घटनाओं के कारण दुनिया भर में चर्च की प्रतिष्ठा गिरी है, जिसे स्वयं पोप जान बेनेडिक्ट भी रोकने में असफल रहे अंततःअसमर्थ के कारण उन्होने पोप के पद से स्तीफा दे दिया। भारत में भी चर्च के बड़े पदाधिकारीयों द्वारा ऐसे कृत्यों की जिम्मेदारी लेते हुए नैतिकता के तकाजे को मानते हुए अपने पदों को त्यागते हुए इस प्रकार की घटनाओं की घोर भर्तस्ना करनी चाहिए। ताकि मानव के जीवन में सुख एवं शांति का वास हो सके।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

आपको नींद कैसे आ गयी : देश के सरदार


     अपने देश में अनेक सरदार हुए है, लेकिन मै एक सरदार की बात कर रहा हु | वह अपने में अब तक का केवल अकेला एक सरदार है | अभी तक वह अपने आप वही एक सरदार है | सरदार भी तो ऐसा सरदार बस कहिए मत वह भी अपने में एक ही सरदार है | सरदार के बारे में अनेक बात है लेकिन यहाँ पर कितने बात बताया जाय | कल की घटना को ले लिया जाये तो वह अपने ट्विटर पर चिंता व्यक्त किया और कहाकि- किसी प्रकार की कमी नहीं होने देगे | सारी प्रशासन को आदेश दे दिया हु | सभी लोग लग जाओ | मारे गये देश के नागरिकों को शोक संवेदना व्यक्त कर अपनी .... बंद कर सो गये |



     कुंभ नगरी में अफरा तफरी मचा हुए था, लोग चिल्ला रहे थे, पुलिस लाठी मार रही थी , मदद के लिए न तो जिला प्रशासन नही रेलवे प्रशासन | जिला प्रशासन तो अखिलेश की यही शादी में बाजा बजाने में बीजी था | रेलवे प्रशासन जनता पर लाठी बर्षा कर रहे थे | इधर जिम्मेदारी की बात आई तो एक दुसरे के उपर डालने के सिवाय कोई काम नहीं | रेल मंत्री तो कहा की भीड़ अधिक हो गया था और रेलवे सभी मदद कर रहा है | लेकिन स्टेशन पर तो कुछ और ही हो सामान विखरे पड़े थे, लोग बदहास हो कर मदद के लिए चिल्ला रहे थे | अपनी जान बचने के लिए लोग एक दुसरे के ऊपर कूद गये, लेकिन जान तो नहीं बचा, चला जरुर गया | लोग चिल्ला रहे थे, कुछ लोग आये जरुर, लेकिन घायलों को डाक्टर की जरुर थी, घंटो तक चिकित्सा सुबिधा नहीं मिली | अगर यह चिकित्सा की सुविधा मिला होता तो अनेक जाने बच गया होता | सुबह तक पूरा प्रयागराज को बंद कर दिया गया, न ट्रेन चला नहीं बस |


     यह कुंभ है जो हजारों वर्षो से इस राष्ट्र को सांस्कृतिक रूप से एक रखने कार्य किया है | यह पुरे राष्ट्र शक्ति का एक केंद्र है | हिदू संस्कृति और सनातन धर्म का चितन तथा विस्तार की भूमिका हजारों वर्षो यही से होता आया | यह कुंभ किसी सरकार की कृपा नहीं चल रहा | कुंभ की कृपा से अनेक सरकार चल रही है | यहाँ जो सरकार है कुछ दिनों बाद उनका नाम लेने वाले नहीं रहेगे | इस प्रकार महाकुंभ में आने वाले भक्तो को अपमानित करने का काम कोई भी न करे | कुंभ की ही इतनी शक्ति है इक़बाल ने कहा कि- यूनान म्रिस रोमा सब मिट गये जहा से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं | आस्ट्रेलिया में एक मुसलमान को गिरफ्तार किया गया तो रात भर नीद नहीं आई थी सरदार को ? लेकिन इतने सारे ४० हिदू मारे अनेक लोग घायल हो गये, लेकिन सरदार सो कैसे गये | हजारों वर्षो से करोड़ों लोगों केवल स्नान करने के लिए आते है, देश के प्रधानमंत्री, गृहमन्त्री,रेलमंत्री तथा राज्यों मंत्री के साथ एक कुंभ स्थल का दौरा कर किसी भी घटना से निपटने तैयारी होनी चाहिए था | क्योंकि सरदार तो धर्म निरपेक्ष है | सरदार के पूर्वज यदि धर्मनिरपेक्ष होते तो क्या ये सरदार होते | ऐसा न हो लोग कहे कि - एक था सरदार |