मंगलवार, 30 जुलाई 2019

भारत में मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी



भारत की संसद ने मुस्लिम महिलाओं की मांग पर तीन तलाक को अपराध का प्रस्ताव पास कर दिया है कुछ दिनों बाद यह कानून बन जायेगा मोदी सरकार ने तीन तलाक को कानून बनाने के लिए अपने घोषणापत्र में कहा था आज उनकी सरकार ने तीन तलाक को अपराध घोषित संसद राज्यसभा से प्रस्ताव पास कराकर किया मुझे याद आ रहा है - मोहम्मद अहमद खान व शाहबानो बेगम केस

कुछ दसक वर्ष पूर्व देश की सर्वोच्च अदालत ने भी मुस्लिम समाज से जुड़े तीन तलाक को अवैध करार दिया और केंद्र सरकार को आदेश दिया है, कि वजह जल्द ही इस मुद्दे पर कानून बनाए इसी के साथ इस केस को लड़ने वाली तमाम महिलाओं को चेहरे पर मुस्कान है ये सभी महिलाओं जीत गईं, लेकिन आज शाहबानो बेगम को याद किया जाना बहुत जरुरी हैशाहबानो बेगम ने भी गजब का मनोबल और साहस दिखाया था, वह कोर्ट में मोहम्मद अहमद खान व शाहबानो बेगम केस तो जीत गई थी, लेकिन हकीकत में उसे राजनीति ने हरा दिया था..... 
यह पूरा मामला 6 नवम्बर 1978 का था कि इंदौर निवासी शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ( बड़े वकील थे ) ने दूसरी शादी करने के बाद तलाक दे दिया था पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने मुल्ला और मौलवियों के पास गई लेकिन किसी ने भी मदद नहीं की आखिर में कोर्ट में जाकर कानून की शरण ली मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और हुई सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचते मामले को सात साल बीत चुके थे 23 अप्रैल 1985 उस पर 5 जजों की खंडपीठ ने फैसला सुनवाई चीफ जस्टिस वाई वी चन्द्रचुड  खंडपीठ ने (CRPC) अपराध दंड संहिता की धारा 125 के अंतर्गत निर्णय दिया जो हर किसी पर लागू होता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाते हुए शाहबानो के हक में फैसला देते हुए, मोहम्मद अहमद खान को 500 रूपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया

मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के वकील मो अहमद खान की शाहबानों से 1932 में निकाह हुआ था। शाहबानो से पांच बच्चे हुए थेलेकिन इसी बीच वकील खान से 14 साल बाद 1946 में दूसरा निकाह काफी कम उम्र महिला से साथ कर लिया शाहबानो अपने बच्चों के परवरिश के लिए खान के साथ रही। लेकिन 1978 एक दिन ऐसा आया कि वकील खान ने तलाक देकर धक्के मारकर उस घर से निकल दिया जिस घर में निकाह के बाद दुल्हन बनकर आई थी।कुछ महीनों तक 200 रूपये गुजरा भत्ता देता रहावह भी कुछ महोनों में बंद कर दिया। एक मुस्लिम तलाकशुदा शाहबानो बेगम महिला समाज में जीने के लिए अपने अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू कीजो उसे भारतीय संविधान देता है। शुरू में वह काजी के पास भी गईलेकिन इस्लाम में उसे अधिकार नहीं मिला। तो भारतीय संविधान के तहत (CRPC) अपराध दंड संहिता की धारा 125 के तहत इंदौर न्यायालय का दरवाजा खटकाया। शाहबानो बेगम ने अपने बच्चों सहित जीविकापार्जन के लिए 500 महिना गुजरा देने की मांग की लेकिन मो अहमद खान ने न्यायालय को कहा कि मैने निकाह के समय तय की गई मेहर की राशी जो 5400 दे दिया तथा मुस्लिम पर्सनल ला के तहत गुजरा भत्ता देने के लिएबाध्य नहीं हू। इंदौर न्यायालय कोई भी तर्क नहीं माना तथा वकील मोहम्मद अहमद खान को 25 रूपये महिना गुजरा भत्ता देने का आदेश दिया। पच्चीस रूपये में गुजरा करना मुश्किल थाइसलिए शाहबानो ने मध्यप्रदेश के उच्च न्यायालय में गई। जिसे उच्च न्यायलय ने 1 जुलाई 1980 को शाहबानो के पक्ष में फैसला देते हुए गुजरा भत्ता 179 रूपये माहवार देने का आदेश दिया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ मो अहमद खान ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की जो भारतीय इतिहास में अध्याय लिखने वाला है।  

यह अपील सबसे पहले तीन फरवरी 1981 को दो जजों की बेंच के सामने आई। जस्टिस मुर्तजा फजल अली और ए. वरदाराजन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पांच जजों की खंडपीठ को रेफर कर दिया। पांच जजों की इस खंडपीठ में थे जिसमे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़, न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा, न्यायाधीश डीए देसाई, न्यायाधीश ओ. चिनप्पा रेड्डी और न्यायाधीश ईएस वेंकटरमैया ने सुनवाई की। उच्चतम न्यायालय मोहम्मद अहमद खान व शाहबानो बेगम केस की सुनवाई चार साल तक चलती रही। मो अहमद खान  का तर्क था कि उसने दूसरा निकाह कर लिया है, जो इस्लामिक क़ानून के तहत जायज है मेहर की राशि दे दिया, इसलिए अब पहली बीबी को गुजारा भत्ता देने के लिए वह बाध्य नहीं। उच्चतम न्यायालय ने 23 फरवरी 1985 को फैसला सुनाया। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को सही करार दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में भारत सरकार को एक दिशा दिया कहा कि देश में समान नागरिक क़ानून (UCC)  की आवश्यकता है, जिस पर सरकार को विचार करना चाहिए। लेकिन सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिमों पर भी लागू होती है। यह धारा किसी जाति, धर्म और वर्ण में कोई भेद नहीं करती। शाहबानो के पति को उसे गुजारा भत्ता देना ही होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमायत उलेमा-ए-हिंद भी इस मामले में पक्षकार बन गए थे। 

      
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरजोर विरोध किया शाहबानो के कानूनी तलाक भत्ते पर देशभर में राजनीतिक बवाल मच गया राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाले मुआवजे को निरस्त करते हुए एक साल के भीतर मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, ( 25 फरवरी 1986 ) पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। एक मुस्लिम हिम्मती महिला शाहबानो ने तीन तलाक की लड़ाई को जीत कर हार गई क्योंकि मुस्लिम कट्टरपंथी के दबाव में आकर राजीव गाँधी की सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले को पलट दिया आगे बीमार शाहबानो ने ब्रेनहेमरेज की कारण 1992 निधन हो गया। फिर वक्त बदला सायरा बानो ने फिर से सुप्रीमकोर्ट में अपील की, मोदी सरकार से कानून बनाकर बाजी पलट दिए   

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

20 वर्ष ऐतिहासिक कारगिल विजय दिवस -




आज कारगिल विजय दिवस के 20 साल पूरे हो गए। 26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में भारत को विजय मिली थी, इस वजह से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में 1999 उस साल नए रूप में सामने आया, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के नेत्रत्व में  अटारी वाघा सीमा पर बस की कूटनीति की शुरुआत हुई लेकिन तीन महीनों में कारगिल के युद्ध की ओर रुख किया। इस लिए पाकिस्तान पर विश्वास नही किया जा सकता है । करगिल युद्ध की जीत की घोषणा तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजेपयी ने 14 जुलाई को की थी, लेकिन आधिकारिक तौर पर 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस की घोषणा की गई थी।

एक चरवाहे ने भारतीय सेना को करगिल में पाकिस्तान सेना के घुसपैठ कर कब्जा करने की सूचना तीन मई 1999 को सेना की चौकी को दी थी। कारगिल से 60 किमी दूर तथा सिन्धु नदी के किनारे बसा एक गाव गरकौन के निवासी श्री ताशी नामग्याल ने अपनी यार्क को ढूढने के लिए सीमा के पास गया था। उसने देखा की पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल के चोटी पर कब्जा कर चुके है, उन्होंने पास की भारतीय चौकी को सुचना दी। उसके बाद दिल्ली तक बात पहुची की पाकिस्तान ने 150 किमी क्षेत्र में 10 किमी तक अन्दर घुस आया है। जब भारतीय सेना को अंदाजा नहीं मिला की पाकिस्तान की सेना बहुत संख्या में भारत की सीमा में घुस आये है।

जब भारतीय नेतृत्व को मामले की गंभीरता का पता चला तो उनके पैरों तले ज़मीन निकल गई भारतीय प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को फ़ोन मिलाया वाजपेयी ने नवाज़ शरीफ़ से शिकायत की कि आपने मेरे साथ बहुत बुरा सलूक किया है एक तरफ़ आप लाहौर में मुझसे गले मिल रहे थे, दूसरी तरफ़ आप के लोग कारगिल की पहाड़ियों पर क़ब्ज़ा कर रहे थे  नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि उन्हें इस बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं है मैं परवेज़ मुशर्रफ़ से बात कर आपको वापस फ़ोन मिलाता हूँ तभी वाजपेयी ने कहा आप एक साहब से बात करें जो मेरे बग़ल में बैठे हुए हैं नवाज़ शरीफ़ उस समय सकते में आ गए जब उन्होंने फ़ोन पर मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार की आवाज़ सुनी दिलीप कुमार ने उनसे कहा, "मियाँ साहब, हमें आपसे इसकी उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आपने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की बात की है मैं आपको बता दूँ कि जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है, भारतीय मुसलमान बुरी तरह से असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और उनके लिए अपने घर से बाहर निकलना भी मुहाल हो जाता है

भारत ने 26 जुलाई 1999 को करगिल युद्ध (Kargil War) में विजय हासिल की थी। करगिल युद्ध में भारत की जीत के बाद से हर साल 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas) मनाया जाता आ रहा है। यह दिन करगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों के सम्मान हेतु मनाया जाता है। करगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है। करगिल युद्ध (Kargil War) लगभग 60 दिनों तक चला और 26 जुलाई को उसका अंत हुआ। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया। यह युद्ध ऊंचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को लड़ने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ सेना की ओर से की गई कार्रवाई में भारतीय सेना के 527 जवान शहीद हुए तो करीब 1363 घायल हुए थे। इस लड़ाई में पाकिस्तान के करीब तीन हजार सैनिक मारे गए थे, मगर पाकिस्तान मानता है कि उसके करीब 357 सैनिक ही मारे गए थे।

करगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जांबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर देशवासी को गर्व होना चाहिए।

सोमवार, 24 जून 2019

आपातकाल- लोकतंत्र की हत्या

25 जून 1975 को देश में इंदिरा गाँधी द्वारा आपातकाल घोषित किया गया था "आपातकाल" इस दिन को भारत वर्ष में काले अध्याय के रूप में जाना जाता है भारत में लोकतंत्र के उदय के 27 वर्ष में ही, लोकतंत्र की जघन्य हत्या किया गया था इसके लिए केवल कांग्रेस पार्टी तथा श्रीमती इंदिरा गाँधी ही जिम्मेदार थी श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा अपने विरोधियों को समाप्त करने हेतु तथा संविधान द्वारा सामान्य नागरिक को मिले मौलिक अधिकार खत्म, प्रेस पर प्रतिबन्ध तथा आगामी आदेश तक सभी चुनाव स्थगित कर दिए गए थे  

शुरुआत 12 जून 1975 से हो गई, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इस दिन अपने बड़े और साहसिक फैसले में रायबरेली से सांसद के रूप में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया साथ ही हाईकोर्ट ने अगले 6 साल तक उनके किसी भी तरह के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी 'इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण' इस प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को फोन द्वारा धमकी भी दी गई कि इंदिरा गाँधी के खिलाफ फैसले दिए जाने पर जान माल का खतरा रहेगा इसके बाद भी उन्होंने अपराधियों पर कानून डंडा चलाया 

1971 आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने रायबरेली संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था और एक लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीती थीं लेकिन उनके प्रतिद्वंदी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दे दी इंदिरा की इस जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह केस उस समय बेहद चर्चित रहा, जिसे 'इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण' के नाम से जाना गया लेकिन इस चुनाव पर फैसला 4 साल बाद 1975 में आया। इस फैसले के 11 दिन बाद 23 जून को इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट में इसकी चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट की ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ के जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे लेकिन उन्होंने इंदिरा को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की इजाजत दे दी. साथ ही यह भी निर्देश दिया कि वो अंतिम फैसला आने तक बतौर सांसद किसी भी तरह का मतदान नहीं कर सकेंगी

राजनारायण ने अपने केस में इंदिरा गांधी पर भ्रष्टाचार, सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग करने का आरोप लगाया राजनारायण की ओर शांतिभूषण (जो कि प्रशांत भूषण के पिता है) ने जबकि इंदिरा की ओर से नानाभाय पाल्खीवाला ने केस लड़ा शांतिभूषण ने राजनारायण का पक्ष रखते हुए कहा कि इंदिरा ने चुनाव प्रचार में सरकारी कर्मचारियों और संशाधनों तक का इस्तेमाल किया उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री के सचिव यशपाल कपूर का उदाहरण दिया जिन्होंने राष्ट्रपति की ओर से इस्तीफा मंजूर होने से पहले ही इंदिरा के लिए काम करना शुरू कर दिया था यही दलील इंदिरा के खिलाफ गई और कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून के आधार पर उनके चुनाव को खारिज कर दिया

देश में कांग्रेस पार्टी के द्वारा भ्रष्टाचार तथा आम जनता और छात्रों पर हो रहे अत्याचार के कारण इस बीच गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों के कारण विपक्ष एकजुट होता जा रहा था 'लोकनायक' जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो चुका था और केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर थे हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष और हमलावर हो गया

इस बीच दिल्ली की रैली में जेपी ने प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का अंश 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' को अपना नारा बनाया और इसी को आधार बनाकर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात देश में आपातकाल लगाने का फैसला लिया राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया

मंगलवार, 18 जून 2019

ममता सरकार को बदनामी और जनता के सामने अपमानित होना पड़ा


पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और हड़ताली डॉक्टरों के साथ मीटिंग के बाद 7 दिनों की हड़ताल खत्म हो गई। जनता के सामने ममता बनर्जी की सरकार की केवल बदनाम हुए है अब डॉक्टरों से माफ़ी मांगने तथा उनको सुरक्षा देना पड़ा है 
  
नील रतन सरकार मेडिकल कॉलेज कुछ दिन पूर्व 80 वर्ष के वृद्ध की मृत्यु होने के बाद 200 TMC ( बिशेष समुदाय के लोग ) के गुंडों ने मेडिकल कॉलेज में पत्थरबाजी किया था। जिसमे एक डॉक्टर की मौत एक घायल हो गया। इसके ठीक दुसरे दिन डॉक्टरों ने एक दिन का धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया था। इस धरने में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जाकर डॉक्टरों को धमकाया कहा कि आप लोग भाजपा के लोग हो, सरकार के खिलाफ काम करते हो, तुरंत वापस काम पर जाओ नहीं तो ... यही शब्द से बात बिगड़ गई

इसके बाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। यह डॉक्टरों का आन्दोलन पुरे बंगाल में फैल गया। बंगाल में १४ मेडिकल कॉलेज है, सभी डॉक्टरों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। इसका यह परिणाम हुआ, की प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था ठप हो गया। तब जाकर ममता बनर्जी की आंख खुली तक तक देर हो चूका था। इस हड़ताल का असर पुरे देश पर पड़ने लगा। एम्स दिल्ली के डॉक्टरों ने भी काली पट्टी लगाकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। केंद्र सरकार पर हस्तक्षेप करने की मांग भी करने लगे, इसके बाद ममता बनर्जी दबाब में आ गई क्योंकि चुनाव तथा भाजपा के 70 से अधिक कार्यकत्र्ताओं की हत्या हो चुकी है। ममता बनर्जी को डर था, कि कही मोदी सरकार उनकी राज्य की सरकार को बर्खास्त कर सकती है।

इसलिए हड़ताली डॉक्टरों की सभी मांगों को मानने के लिए ममता सरकार मजबूर हो गई है। आज सभी डॉक्टरों हॉस्पिटल में काम पर आ गये होगे। इस आन्दोलन से फायदा किसको हुआ, लेकिन ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। लोकसभा चुनाव में हुए हिंसा ने बंगाल को पुरे देश में बदनाम कर दिया है। ममता बनर्जी को चाहिए था कि बंगाल को नई छवि बनाने की, लेकिन ममता बनर्जी की जिद्द ने हालत को और भी अधिक बिगड़ दिया ।    


शुक्रवार, 14 जून 2019

छत्तीसगढ़ की जनता बिजली कट की अपनी पीड़ा को सोशल मीडिया में शेयर नहीं कर सकते, राजदोह का अपराध हो रहे है दर्ज


ऐसा तो देश में आपातकाल 1975 के समय हुआ कि इंदिरा गाँधी के खिलाफ कोई कह देता था और कोई कॉग्रेसी सुने ले तो उसके खिलाफ देशदोह आरोप लगता है ऐसा ही आरोप एक -
छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव जिले का रहने वाला नाम मांगेलाल अग्रवाल है उसे गुरुवार शाम को गिरफ्तार किया गया उसका अपराध यह है कि उसने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें आरोप लगाए गए हैं कि राज्य सरकार की इनवर्टर बनाने वाली कंपनी से सांठगांठ है
53 वर्षीय मांगेलाल अग्रवाल पर यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड की शिकायत के बाद की गई है पावर कंपनी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि एक अज्ञात शख्स सोशल मीडिया पर गलत जानकारी दे रहा है, और अफवाह फैलाकर सीएम भूपेश बघेल (Bhupesh Baghel) की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है
जिसके बाद अग्रवाल को धारा 124ए(राजद्रोह) और 505/1/2 (सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा) के तहत गिरफ्तार किया गया और इसे इमरजेंसी (आपातकाल) कह सकते है  सोशल मिडिया में हो रही बेइज्जत के बाद छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल ने भी इस मामले में बयान दिया है कि सभी को अपनी बात कहने का हक है अगर कोई व्यक्ति अपनी राय जाहिर करता है, तो राजद्रोह का मामला उस पर नहीं बनना चाहिए यह हमारे मैनिफेस्टो में था कि धारा 124ए को खत्म किया जाएगा लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि यह मामला बिजली के कटने से संबंधित नहीं है बल्कि यह सरकार को जानबूझकर बदनाम करने का मामला है अगर गिरफ्तार व्यक्ति के पास अपने बयान को समर्थन करने वाला कोई सबूत है तो उसे जनता के सामने इन्हें रखना चाहिए

महासमुंद के दिलीप शर्मा ने वेब मोर्चा पोर्टल पर 50 गांवों में 48 घंटे बिजली बंद होने होने की खबर चला दी थी। बिजली कंपनी के डीई एसके साहू की शिकायत पर गुस्र्वार रात 11 बजे पुलिस ने शर्मा को घर से बनियान-टॉवेल में उठा लिया था। पुलिस ने मिथ्या भ्रामक विषयवस्तु को जनमानस में प्रसारित करके जनाक्रोश फैलाने की कोशिश करने का मामला दर्ज किया। शुक्रवार सुबह 11 बजे कोर्ट में पेश किया, उसके बाद शर्मा को कोर्ट ने जमानत दे दी। 

मंगलवार, 11 जून 2019

रायपुर स्काईवॉक प्रोजेक्ट पूरा होने में 80 करोड़, तोड़ने में 8 करोड़



छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर के शास्त्री चौक के चारों ओर की सड़कों पर जिस स्काईवॉक के तैयार होने से पहले ही टूटने का खतरा पैदा हो गया है। भुपेश बघेल सरकार के आने के बाद से राजनीतिक विवाद छिड़ा है कि आखिर इस स्काईवॉक की उपयोगिता तथा इस्तेमाल कितने लोग करेंगे
 ?


जब आप रायपुर के कोर्ट से तहसील कार्यालय जाना पड़े और कलेक्टर कार्यालय आकरकमिश्नर के कार्यालयफिर कागज की फोटो कॉपी करना पड़े। तक समझ में आता हैशास्त्री चौक से गुजरना। शहर का सबसे ज्यादा ट्रैफिक अव्यवस्था का सामना कर पड़ता है। आमजन की सुविधा के लिए स्काईवॉक का योजना डॉ रमन सिंह सरकार ने लाया था। योजना सही हैलेकिन नीयत भी ठीक हैलेकिन कांग्रेस की बघेल सरकार ने तोड़ने की मुड़ में दिख रहा है। कुछ दिनों के समाचार पत्रों में छप रही खबरों पर है।


स्काईवॉक 49 करोड़ के बजट से शुरू हुआ लेकिन देरी के कारण 80 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। मै पिछले 20 सालों से सुन रहा हू कि जीई रोड पर टाटीबंध से आने वाले ट्रफिक जाम अधिक होने के कारण आजाद चौक से लेकर शारदा चौक, जयस्तभ चौक, शास्त्री चौक के ऊपर से तेलीबधा तक प्लाईओवर बनाया जायेगा  1998 में मध्यप्रदेश शासन को रायपुर नगर निगम से प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन खबर केवल समाचार पत्र में छपता ही रहा। अब तक रायपुरवासियों को यह सपना ही रहा। इस बीच कई बार सर्वे हुए लेकिन प्लाईओवर का सपना रायपुरवासियों के लिए दूर ही है।         

फिर से छत्तीसगढ़ शासन ने वर्ष 2014-15 में मुंबई की क्यूब कंसलटेंसी से जीई रोड पर फ्लाईओवर निर्माण के लिए सर्वे कराया। लेकिन फिर से फ्लाईओवर का प्रोजेक्ट निरस्त हो गया। फिर वर्ष 2015-16 में स्काईवॉक बनाने के लिए सर्वे कराया गया। इसका ठेका एसएन भावे कंसल्टेंसी को दिया गया। उस दौरान इस प्रोजेक्ट के लिए विभागीय बजट में 20 करोड़ की लागत भी तय थी। जिसे बाद में बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए की गई। 

छत्तीसगढ़ शासन की कोशिशों के बाद भी स्काईवॉक काम में देरी भी हुई, यह भ्रष्टाचार की संदेह की संकेत करती है। समय पर काम पूरा नहीं होने से आम लोगों को परेशानी हो रही थी। इस बात का फायदा उठाकर कुछ लोग विरोध कर रहे है। भूपेश बघेल की सरकार उन्ही लोगों के दबाब में आकर स्काईवॉक को तोड़ने की बात कर रहे है। स्काईवॉक का निर्माण 70 प्रतिशत पूरा हो चका और अब तक 80 करोड़ के पास निर्माण का खर्च पहुच चूका है।लगभग 7 महीने से काम बंद है आदि सरकार स्काईवॉक को तोडती भी है, तो 8 करोड़ खर्च होगे तथा 3 महीने का समय लगेगा। स्काईवॉक से शास्त्री चौक की रौनक बढ़ जाएगी, पैदल चलने वालों को रास्ता, युवाओं के लिए एक सेल्फी लेने का केंद्र भी बन जायेगा।  

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शास्त्री चौक पर पैदल चलने वालों का हवाला देते हुए स्काईवॉक का निर्माण अप्रैल 2017 में शुरू कराया। तर्क दिया गया कि शहर के इस प्रमुख चौक के पास डीके हास्पिटलतहसील ऑफिसकलेक्ट्रेटकचहरी और डॉ. आंबेडकर अस्पताल जैसे आम लोगों से जुड़े हुए सरकारी संस्थान संचालित हैं। स्काईवॉक का एक सिरा जयस्तंभ चौक की तरफ तो दूसरा आंबेडकर अस्पतालतीसरा घड़ी चौक और चौथा सिरा मोतीबाग रोड की तरफ उतरेगा। इन रास्तों से लोग पैदल आना-जाना करेंगे।








शनिवार, 8 जून 2019

प्रधानमंत्री की विदेश दौरा,विदेश मंत्रालय की महीनों की तैयारी के बाद संभव होता है -



लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद से विदेश मंत्रालय में सभी अधिकारी तीन महीने की छुट्टी पर चले जाते थे। लेकिन इस बार ऐसा नही हुआ। क्योंकि देश का चौकीदार जाग रहा था। मतलब यह है कि प्रधानमंत्री Narendra Modi जी ने चुनाव के समय भी, अपने विदेश नीति के लिए काम कर रहे थे। उनका आत्मविश्वास यह कहा है कि, वे पुन प्रधानमंत्री बनने जा रहे है।  South block में ही प्रधानमत्री कार्यालय तथा विदेश मंत्रालय स्थित है। जहां वे सारा काम करते है।

नरेन्द्र मोदी पिछले 5 वर्षो से एक भी दिन छुट्टी नहीं लिये है। इसलिए उन्होंने अपने काम को लेकर संबधित अधिकारियों को भी छुट्टी नहीं लेने दिया। चुनाव घोषणा होने से पूर्व ही सारे मीटिंग की तैयारी भी कर रहे थे। ऐसा आजादी के बाद पहली बार हुआ कि विदेश मंत्रालय के अधीनस्थ सभी दूतावास अपनी देश की योजना पर किया। चुनाव आयोग के द्वारा घोषणा पर सब अधिकारी व कर्मचारी छुट्टी पर चले जाते थे। अपने प्रधानमंत्री #narendramodi ने चुनाव प्रचार के दौर विदेश मंत्रालय के साथ PMO से लगातार जानकारी ले रहे थे। शपथ ग्रहण के बाद 10 दिनों में मालदीव की यात्रा तथा श्रीलंका पर पहुचे है। यह एक दो दिन कि तैयारी से नहीं बल्कि महीनों के तैयारी के बाद तय हो पता है। 

भारत सरकार के अधीनस्थ सभी देशों के दूतावास अपने सक्रिय रूप से काम कर रहे है। उन्होंने अपने छह महीने के विदेश प्रवास की योजनाओं पर प्रतिदिन की जानकारी अपडेट प्राप्त करते थे। चुनाव जीतने के बाद लोग मन्त्रीमंडल की तैयारी में लगे होंगे लेकिन मोदी आगामी प्रवास पर अपना एजेंडा तय कर रहे थे 14 15 शंघाई समिट (SCO) के लिए कगिकिस्तान की राजधानी बिश्केक  में जाने वाले है । जहा रूस के राष्ट्रपति पुतिन तथा चीन के राष्ट्रपति शीपी जिंग से मिल कर बात करने वाले है। जून के आखिर में जापान ओसका में G-20 की मीटिंग में जानेवाले है। वहा डोनाल्ड ट्रम तथा अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष के साथ मीटिंग होनी है।  
·        भूटान तथा नेपाल के दौरे में जाने वाले है  
·        अगस्त में फ़्रांस जाने वाले है वहा G-7 के मीटिंग में रहने वाले है